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Cows and oxen make up, why is this Pola festival celebrated?

गायों और बैलों का होता है शृंगार, आखिर क्यों मनाया जाता है यह पोला पर्व

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नेशनल थॉट्स स्पेशल  : भारत एक ऐसा देश है जहां धरती और गाय दोनों को माँ का दर्जा दिया जाता है | वैसे भी भारत एक कृषि प्रधान देश है | जैसे किसान और खेत का सीधा संबंध है, वैसे ही खेत की जमीन और मवेशी का रिश्ता सदियों से रहा है | हिंदू धर्म में भी गाय बैल और मवेशियों को पूजने की परंपरा है | यह सब जानकारी हम आपको इसलिए बता रहे है क्योंकि ऐसा ही एक त्योहार है बैल पोला पर्व | यह पर्व को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है |
 
आखिर कब है पोला उत्सव
भादों माह की अमावस्या के दिन प्रत्येक वर्ष पोला उत्सव मनाया जाता है | किसान भाई इस पर्व के दिन गाय एवं बैलों की विशेष सेवा और पूजा करते हैं | झारखंड में सोहराई पर्व में गायों की विशेष पूजा की जाती है | अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक इस बार सोमवार यानी छह सितंबर को यह पर्व मनाया जा रहा है | विदर्भ में दो दिनों तक पोला उत्सव मनाया जाता है | पहले दिन मोठा पोला और दूसरे दिन तनहा पोला मनाया जाता है | तनहा पोला में बच्चे खिलौने के बैल सजाकर घर-घर लेकर जाते हैं. बदले में उन्हें हर घरों से पैसे अथवा उपहार मिलते हैं |

मवेशियों को माना जाता है परिवार का सदस्य
आज भले ही आधुनिकता के दौर में अत्याधुनिक कृषि मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है |
 ट्रैक्टर का इस्तेमाल किया जा रहा है, इसके बावजूद आज भी देश के 80 फीसदी किसान कृषि के लिए बैल और गायों पर ही निर्भर हैं | यही कारण है कि किसान अपनी गाय और मवेशियों को भगवान मानते हुए साल में एक बार उनकी पूजा करते हैं | आज भी गाय और बैल को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है | इसलिए महाराष्ट्र के अधिकांश घरों के दरवाजे पर गाय और बैल बंधे हुए रहते हैं | किसानों के लिए ये पशु मां लक्ष्मी जैसा स्थान रखते हैं | सिर्फ छोटे किसान ही नहीं बड़े किसान भी कई ट्रैक्टरों का मालिक होने के बावजूद अपने घर के बाहर गाय और बैल को बांधना अपना सम्मान मानते हैं. किसान मानते हैं कि उन गाय बैलों की बदौलत ही आज वो तरक्की कर रहे हैं | इसलिए गायों को वो परिवार का अहम सदस्य मानते हैं |

कैसे मनाया जाता है बेल पोला पर्व
इस पर्व को मनाने के लिए भादों अमावस्या से एक दिन पहले ही गाय और बैलों की रस्सियां खोल दी जाती है | उन्हें आजाद कर दिया जाता है | इनके शरीर पर हल्दी, उबटन और सरसों तेल लगाकर इनकी अच्छे से मालिश करते हैं. इसके अगले दिन इन्हें अच्छे से नहलाया जाता है |  फिर उन्हें अच्छे से सजाया जाता है | गले में सुंदर-सुंदर घंटीयुक्त माला पहनायी जाती है | जिन गाय बैलों की सींग होती हैं उन्हें रंगा जाता है | उसमें धातु के छल्ले पहनाये जाते हैं साथ ही कपड़े भी पहनाए जाते हैं |
 
घुंघरू, घंटी, कौड़ी से श्रृंगार

बैलों को स्नान करवाकर सींग, खुर में नेल पॉलिश करके गले में घुंघरू, घंटी या कौडी से बने आभूषण पहनाएंगे। युवतियां गांव के बाहर मैदान या चौराहों पर (जहां नंदी बैल या साहडा देव की प्रतिमा स्थापित रहती है) पोरा पटकने जाएंगी। एक-एक मिट्टी के खिलौने को पटककर-फोड़ेंगी।

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