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Fit India Freedom Rider Biker Rallies successfully concluded at JLN Stadium

फिट इंडिया फ्रीडम राइडर बाइकर रैलियां सफलतापूर्वक जेएलएन स्टेडियम में सम्पन्न हुईं

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फ्रीडम राइडर बाइकर रैलियों का समापन समारोह गुरुवार को नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सम्पन्न हुआ। इस अनोखे अभियान का आयोजन ऑल इंडिया मोटरबाइक एक्सपेडिशन (एआईएमई) ने किया था, जिसे केंद्र सरकार ने अपने फिट इंडिया के प्रमुख कार्यक्रम के तौर पर समर्थन दिया था।

समापन समारोह में खेल सचिव श्रीमती सुजाता चतुर्वेदी, भारत खेल प्राधिकरण के महानिदेशक श्री संदीप प्रधान तथा केंद्रीय खेल मंत्रालय और भारत खेल प्राधिकरण के अन्य गणमान्य उपस्थित थे।   11 महिलाओं सहित कुल 75 बाइक सवारों ने 75 दिनों से अधिक की अवधि में 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरते हुये 18,000 किलोमीटर की दूरी तय की; इस दौरान कन्याकुमारी से वाराणसी और गांधीनगर से शिलांग तक 75 शहरों/कस्बों से रैली निकली।

अपने अभियान के दौरान बाइक सवारों ने केवड़िया में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी, शिमला में वाइसराय की कोठी, गुवाहाटी में कामाख्या मंदिर, मदुरै में मीनाक्षी मंदिर आदि जैसे प्रमुख स्थानों को देखा। बाइक सवार उत्तरी पट्टी के मैदानों सहित पश्चिम के रेगिस्तान, पूर्वोत्तर के पर्वतों, दक्षिण के समुद्री तटों जैसे विभिन्न इलाकों से गुजरे तथा सियाचिन जैसे अत्यंत दुरूह मौसमी हालात का सामना किया।

श्रीमती सुजाता चतुर्वेदी ने कहा, “मैं इस असाधारण कारनामे के लिये सभी 75 राइडरों को बधाई देती हूं। मुझे खुशी है कि आप लोग सकुशल लौट आये और आपने अनेक लोगों को प्रेरित किया। स्वस्थ और फिट रहना राष्ट्रीय कर्तव्य है और मैं चाहती हूं कि हरेक व्यक्ति इस राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन करे तथा स्वस्थ व फिट रहे।”

कार्यक्रमों में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री, मणिपुर व गुजरात के राज्यपाल, स्थानीय सांसद, जिलाधिकारी और अन्य विशिष्टजन सम्मिलित हुये। कार्यक्रमों के दौरान बाइकर दल ने अभियान के बारे में बताया और अपने अनुभव साझा किये। उन्होंने दर्शकों को प्रेरित करने के लिये फिटनेस के गुर भी बताये। बाइक सवारों ने गुजरात में गरबा जैसे विशेष आयोजन में भी हिस्सा लिया, जो इस अभियान की प्रमुख विशेषता थी।

सबसे बुजुर्ग महिला राइडर 59 वर्षीय नीता खांडेकर ने कहा, “मेरे साथी राइडरों ने जो मार्गदर्शन किया, वह जबरदस्त था। रास्ते का इलाका, खासतौर से पूर्वोत्तर का इलाका बहुत भिन्न था। सड़कों पर धूल और कीचड़ था। हम बार-बार फिसलते थे, लेकिन फिर उठ जाते थे। हमने भाईचारा भी सीखा। अकेले-अकेले चलने वाले हम लोग, सामूहिक राइडर बन गये तथा कम से कम चीजों के साथ जीना सीखा।”

 

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