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Real Hero: Know who was Khudiram Bose? Who got "death-a-death" at the age of just 18

Real Hero : जानिए कौन थे खुदीराम बोस ? जिन्हें महज 18 वर्ष की आयु में मिली “सजा-ए-मौत”, अंग्रेजों की उड़ाई थी नींद

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स्पेशल स्टोरी : भारत को आजाद हुए 75 साल होने जा रहे है लेकिन आज भी उस लड़ाई में शाहिद हुई कई क्रांतिकारियों के बारे में लोग नहीं जानते | भारत को आजाद करवाने के लिए ना जाने कितने वीरों ने शहादत दी | उन्हीं में से एक थे खुदीराम बोस जोकि ब्रिटिश शासन का विरोध करने वाले सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बोस की वीरता और योगदान की कहानी महत्वपूर्ण है |
आइए जानते है क्यों महत्वपूर्ण है बोस की कहानी 
ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए उन्हे अंग्रेजों ने मौत की सजा सुनाई गई थी तब वे सिर्फ 18 वर्ष के थे। महज 18 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले खुदीराम बोस को 1908 में सजा हुई थी | अपनी शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हुए कि बंगाल में उनके नाम की धोती बुनी जाने लगीं और युवा उस धोती को पहना करते थे।
दिया अंग्रेजों को खास संदेश 
फांसी से पहले खुदीराम बोस की एक तस्वीर सामने आई थी जिसमें उनके पैरों में रस्सी तो थी लेकिन चेहरा आत्मविश्वास और देश के लिए शहीद होने के गर्व से भरा हुआ था। उस तस्वीर में करोड़ों भारतीयों के साथ-साथ उन अंग्रेज शासकों के लिए भी संदेश छिपा था कि हम भारतीय सजा-ए-मौत से घबराते नहीं हैं, हमें इससे डराने की रत्ती भर भी कोशिश मत करना।
 
खुदीराम बोस से जुड़ी बातें :- 
 
खुदीराम बोस का जन्म बंगाल के मिदनापुर में हुआ था। वह तब 15 साल के थे जब अनुशीलन समिति का हिस्सा बने थे। यह 20 वीं सदी की संस्था थी जो बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रचार-प्रसार का काम करती थी। एक साल में ही खुदीराम बोस ने बम बनाना सीख लिया था और वे उन्हें पुलिस थानों के बाहर प्लांट करते थे।

जज ने दी फांसी की सजा तो उनसे बोले खुदीराम – आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूं

कहते हैं कि जब 13 जून 1908 को मामले में खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई गई तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। फैसला देने के बाद जज ने उससे पूछा, ‘क्या तुम इस फैसले का मतलब समझ गए हो?’ इस पर खुदीराम ने जवाब दिया, ‘हां, मैं समझ गया, मेरे वकील कहते हैं कि मैं बम बनाने के लिए बहुत छोटा हूं। अगर आप मुझे मौका दें तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूं।’

माथे पर नहीं तो कोई शिकन 

इस घटना के बाद बंगाल में छात्रों ने कई दिनों तक खुदीराम बोस की फांसी का विरोध किया लेकिन 11 अगस्त की सुबह 6 बजे खुदीराम को फांसी दे दी गई। वहां मौजूद लोगों के अनुसार फांसी मिलने तक वह एक बार भी न घबराए थे |

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