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Real Hero: Serving dogs for three decades, spending 40-45 thousand months, taking care from food to treatment

Real Hero : तीन दशकों से कर रहे है कुत्तों की सेवा, 40-45 हजार महिना खर्च, खाने से लेकर इलाज तक का रखते है ख्याल

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इंसान का सबसे अच्छा दोस्त श्वान क्यों ? 
 
न्यूज डेस्क ( नेशनल थॉट्स ) : आज हम आपको एक ऐसे कपल की कहानी बताने जा रहे है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी श्वान (कुत्ता) की सेवा में लगा दी | कुत्ता ही एक ऐसा जीव, जो शुरू से ही इंसानो के बीच रहा है। कुत्तों को इंसान का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है। पहली रोटी गाय की और आखिरी रोटी कुत्ते की, ऐसी परम्परा हिंदुस्तान में शुरू से ही रही है | लेकिन अब यह कुछ हद तक धूमिल होने लगी है।
कोटा के रहने वाले श्यामवीर और उनकी पत्नी कर रही श्वान ( कुत्तों ) की सेवा 
 
आज एक इस आधुनिक युग में लोगों को कुत्तों की उपस्थिति नागवार गुजरने लगी है। फिर भी ऐसे कई लोग हैं, जो आज भी इंसानियत को जिन्दा रखे हुए हैं और बेजुबानों की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। कोटा (राजस्थान) के रहने वाले 65 वर्षीय श्यामवीर सिंह और 66 वर्षीया उनकी पत्नी, वैद्य विजेन्द्री पिछले तीन दशकों से भी ज्यादा समय से लगातार इन बेजुबानों की सेवा कर रहे हैं।

कार में साथ लेकर चलते है उनका भोजन 
 
राजकीय सेवा से रिटायर श्यामवीर, अपनी पेंशन कुत्तों पर खर्च कर देते हैं। वह और उनकी पत्नी, रोज़ 100-110 रोडसाइड कुत्तों का पेट भरते हैं। इसके लिए वे 8 किलो आटा, 3.5 किलो पेडिग्री (डॉग फ़ूड), 15 अंडे और 5 लीटर दूध से उनका भोजन बनाते हैं और कार में लेकर उन्हें खिलाने निकल जाते हैं।

विधि-विधान से करते हैं Street Dogs का अंतिम संस्कार

इस कपल ने अब तक ऐसे 250 से ज्यादा जानवरों का विधि-विधान से अंतिम संस्कार भी किया है, जिसे वे उनका अधिकार बताते हैं। गंभीर बीमारी से ग्रसित कुछ ऐसे कुत्ते, जिन्हें हमेशा देख-रेख की ज़रूरत है, उन्हें श्यामवीर ने अपने घर में ही जगह दे रखी है। इस तरह 10-12 कुत्ते उनके घर पर हमेशा रहते हैं। भूख की वजह से रोड पर कुत्तों की हालत ऐसी है कि देखकर आप चौंक जाएंगे। श्यामवीर ने तो कुत्तों को गोबर खाते हुए भी देखा है। ये बेजुबान, गाड़ी से एक्सीडेंट हो जाने से तड़पते रहते हैं, घाव हो जाता है, कई के तो कीड़े पड़े होते हैं। इस दर्द को देख श्यामवीर बहुत दुखी होते हैं।

कब हुई थी इसकी शुरुआत?

जानवरों को जरुरत के समय अस्पताल लेकर जाना, उनकी नसबंदी करवाना, ताकि उनकी जनसंख्या में इजाफा न हो, श्यामवीर ये सारे काम करते हैं और इसे अपना धर्म मानते हैं। वह और उनकी पत्नी वैद्य विजेन्द्री देवी की पूरी दिनचर्या ही इन कुत्तों की सेवा में निकल जाती है। उनका घर एक पॉश इलाके में है, इस घर में कदम रखते ही कुत्तों का पिंजरा दिख जाएगा, जिसमें ज्यादातर कुत्ते ऐसे हैं, जो काफी बीमार होने के कारण यहां लाए गए थे। यह दंपत्ति, साल 1987 से इन मासूम जानवरों की सेवा में लगा है।

कैसे आया Street Dogs की सेवा का विचार?

जनवरी 1987 की सर्दी में, रात को कुत्ते का एक छोटा सा बच्चा अपने परिवार से बिछड़ कर, श्यामवीर के घर के बाहर आ गया और कांपता हुआ जोर-जोर से रोने लगा। उसकी आवाज सुनकर श्यामवीर का बेटा उसे घर ले आया और उसे घर पर रखने की जिद करने लगा। श्यामवीर ने पहले तो मना किया, लेकिन बाद में उसे रखने के लिए मान गए और उसका नाम रखा ‘रोनू’।

बना परिवार का सदस्य 

धीरे-धीरे रोनू उनके परिवार का सदस्य हो गया। कुछ समय बाद, रोनू के साथ गली की दो फीमेल श्वान भी घर में रहने लगीं और देखते ही देखते उनके घर के आस-पास लगभग 40 कुत्ते हो गए और श्यामवीर की कॉलोनी में ही आस-पास रहने लगे। श्यामवीर सिंह और उनके पूरे परिवार को इनसे इतना लगाव होता गया कि पूरा परिवार साथ मिलकर, उनके बेहतर खाने से लेकर बीमारी तक का ख्याल रखने लगा।

कारवां बढ़ता गया और हम चलते गए 

फिर तो यह कारवां कब 150 तक हो गया, पता ही नहीं चला। श्यामवीर ने इस बढ़ती आबादी को रोकने के लिए सभी फीमेल डॉग्स की अपने खर्चे पर नसबंदी करवाई। लेकिन मौजूदा 150 कुत्तों के लालन-पालन का जिम्मा अपने सिर से हल्का नहीं किया। रिटायर होने के बाद, श्यामवीर कॉलोनी छोड़कर दूसरी जगह शिफ्ट हो गए, लेकिन अब वह और उनकी पत्नी रोजाना अपनी कार से उन कुत्तों के लिए भोजन-पानी लेकर जाते हैं। इसके अलावा, अभी जहां यह कपल रह रहा है, वहां एक फीमेल श्वान के बच्चों को बड़ी बेरहमी से पत्थर से कुचल कर मार दिया गया। श्यामवीर ने उस फीमेल को अपने घर में जगह दी और इसी तरह 1-1 करके अब उनके घर में 10-12 कुत्ते हो गए हैं।

रोजाना कितना आता है खर्च?

श्यामवीर, राज्य सरकार से मिलने वाली पेंशन का अधिकतम भाग जानवरों की सेवा में लगा देते हैं और श्यामवीर व उनकी पत्नी का खर्च, उनके बच्चे उठाते हैं। यह कपल हर महीने 40-45 हजार रुपये तो नियमित रूप से इन जानवरों पर खर्च करता ही है। इसके अलावा, अन्य रोड साइड कुत्तों के लिए भी वे मेडिकल सहायता उपलब्ध करवाते हैं, जिसमें कई बार हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं।

दिया रोजगार 

कई डॉग लवर्स, जरूरतमंद डॉग्स के लिए मेडिकल और शेल्टर की व्यवस्था कर, बिल की कॉपी इस कपल को भेज देते हैं और श्यामवीर उसका पेमेंट करते हैं। ये दोनों रोजाना सुबह सभी कुत्तों का खाना बनाते हैं। उन्होंने इस काम में मदद के लिए 2 महिलाओं की नियुक्ति भी की है, जिन्हें वे प्रतिमाह 5-5 हजार रुपये तनख्वाह देते हैं।

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