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Special Article: What is Uniform Civil Code? Why is it necessary and the reason for objection

Special Article : क्या है Uniform civil code ? क्यों है जरूरी और आपत्ति की वजह ..

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क्या है UCC ( समान नागरिक संहिता )

समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिये एक समान कानून के साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिये विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एक जैसी स्थिति प्रदान करती है | इसका पालन धर्म से परे सभी के लिए जरूरी होता है |

क्या संविधान में इसके बारे में बताया कोई प्रावधान है ? 


हां, संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा | अनुच्छेद-44 संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्वों में एक है | यानी कोई भी राज्य अगर चाहे तो इसको लागू कर सकता है | संविधान उसको इसकी इजाजत देता है |

ये कानून भारत में पहली बार कब लाया गया ?

समान नागरिक संहिता की शुरुआत ब्रिटिश राज के तहत भारत में हुई थी, जब ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1835 में अपनी रिपोर्ट में अपराधों, सबूतों और अनुबंधों जैसे विभिन्न विषयों पर भारतीय कानून की संहिता में एकरूपता लाने की जरूरत की बात कही थी | हालांकि इस रिपोर्ट ने तब हिंदू और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इससे बाहर रखने की सिफारिश की थी |

वर्तमान स्थिति क्या है 
 
ब्रिटिश शासन में जो व्यवस्था थी, उसमें बदलाव किया जा चुका है | वर्ष 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिये बी.एन. राव समिति का गठन किया गया | जिसकी सिफारिशों के आधार पर हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों के लिए उत्तराधिकार, संपत्ति और तलाक से संबंधित कानून को संशोधित करके जवाहर लाल नेहरू द्वारा वर्ष 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तौर पर नया कानून बनाया गया | हालांकि मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म के लोगों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून बरकरार रहे |

 
 
समान नागरिक संहिता की मांग क्यों होती रही है

  • ताकि समाज के संवेदनशील वर्ग को संरक्षण मिल सके
  • महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित संवेदनशील वर्गों को सामाजिक सुरक्षा मिल सके
  • कानूनों की एकरूपता से देश में राष्ट्रवादी भावना को बल मिलेगा
  • कानूनों का सरलीकरण होगा
  • समान संहिता विवाह, विरासत और उत्तराधिकार समेत विभिन्न मुद्दों के लिए अलग अलग कानून नहीं होकर एक जैसे कानून होंगे |


कुछ लोगों को इस पर आपत्तियां क्यों है ? 

 
  • विश्लेषकों का मत है कि समान नागरिक संहिता की मांग केवल सांप्रदायिक राजनीति के तौर पर की जाती है |
  • समाज के एक बड़े वर्ग को लगता है कि इस सामाजिक सुधार की आड़ में बहुसंख्यकवाद का ही भला ज्यादा होगा | 
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25, जो किसी भी धर्म को मानने और प्रचार की स्वतंत्रता को संरक्षित करता है, वो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता की अवधारणा के विरुद्ध है |

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