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The thinking of hatred prevailing in the society should be changed, anyone can bring change.

 समाज में व्याप्त घृणा की सोच बदलनी चाहिए ,बदलाव कोई भी ला सकता है

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नेशनल थॉट्स ब्यूरो : भारत में अक्सर आपने देखा होगा की लोग अपने पुराने कपड़ों को फ़ैकते नहीं है बल्कि उसको रीसाइकल या फिर किसी व्यक्ति को जरूरी समान के बदले दे दिया जाता है | ठीक इसी प्रकार हमारी आज की कहानी है | आज भी ऐसे लोग है जिन्हे दूसरों की परवाह है | समाज में झूठी अकड़ व शान दिखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है | इसलिए आइए जानते है इसका नुकसान :-
आज की कहानी का मुख्य किरदार है एक महिला | एक व्यक्ति लोगों के घरों के बार चिल्लाता हुआ जाता है की “पुराने कपड़े दे दो और बदले में बर्तन ले लो” | इसी कथन को सुनने के बाद सम्पन्न घर की दिखने वाली महिला दौड़ी चली आई | उसने उसे रोक और पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करने लगी | अंतत: उसने दो साड़ियों के बदले एक प्लास्टिक का टब पसंद कर लिया | व्यक्ति कहता है  “नहीं दीदी ! बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा .” बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा |
महिला ने उसे समझते हुए बोल कि *अरे भैया ! एक एक बार की पहनी हुई तो हैं |  बिल्कुल नई जैसी है | एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं, मैं तो फिर भी दे रही हूँ  | बर्तन वाले ने तुरंत बोल कि नहीं नहीं , तीन से कम में तो नहीं हो पायेगा |
एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की इस प्रक्रिया के दौरान गृह स्वामिनी को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती अर्द्ध विक्षिप्त महिला ने वहाँ आकर खाना मांगने लगी |
 
आदतन हिकारत से उठी महिला की नजरें उस महिला के कपड़ों पर गयी | अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके युवा शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी | क बार तो उस महिला ने मुंह बनाकर वहाँ से चली गई | पर सुबह सुबह का समय है सोचकर अंदर से रात की बची रोटियों मगवायी और उसे रोटी देकर भागा दिया |
महिला पलटते हुए बर्तन वाले से बोली -* *तो भैय्या ! क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ ! “बर्तन वाले ने उसे इस बार चुपचाप टब पकड़ाया और दोनों पुरानी साड़ियाँ अपने गठ्ठर में बाँध कर बाहर निकला | अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई महिला दरवाजा बंद करने को उठी तो सामने नजर गयी | गली के मुहाने पर बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई दोनों  साड़ियों में से एक साड़ी उस अर्ध विक्षिप्त महिला को तन ढँकने के लिए दे रहा था |
 
हाथ में पकड़ा हुआ टब अब उसे चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था | बर्तन वाले के आगे अब वो खुद को हीन महसूस कर रही थी | कुछ हैसियत न होने के बावजूद बर्तन वाले ने उसे परास्त कर दिया था | वह अब अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बिना झिकझिक किये उसने मात्र दो ही साड़ियों में टब क्यों दे दिया था | कुछ देने के लिए आदमी की हैसियत नहीं , दिल बड़ा होना चाहिए |

अब सवाल ये उठता है की आपके पास क्या है ? और कितना है ? यह कोई मायने नहीं रखता ! आपकी सोच व नियत सर्वोपरि होना आवश्यक है | और ये वही समझता है जो इन परिस्थितियों से गुजरा हो |

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