वाराणसी के राजा घतकुमार अपने शासन में न्यायप्रिय और कर्तव्यनिष्ठ थे। एक दिन उन्होंने अपने हरम में एक मंत्री को दुर्व्यवहार करते हुए देखा। यह अनुचित आचरण देखकर राजा ने उसे दंडित किया और राज्य से निष्कासित कर दिया।
निष्कासित मंत्री का प्रतिशोध
अपमानित मंत्री ने श्रावस्ती के राजा वंक के दरबार में शरण ली। कुछ समय बाद, मंत्री ने राजा वंक को वाराणसी राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण भेद बताने शुरू कर दिए। यह जानकर वंक ने वाराणसी पर आक्रमण कर दिया और राज्य को अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में राजा घतकुमार पराजित हुए और उन्हें बंदी बना लिया गया।
कारागार में ध्यानमग्न घतकुमार
रात्रि के समय, जब राजा वंक ने कारागार का दौरा किया, तो उसने घतकुमार को योग और ध्यान में लीन पाया। यह देखकर वह अचंभित हुआ। उसने घतकुमार से पूछा – “तुम्हें भय क्यों नहीं है? और इस संकट की घड़ी में तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो?”
घतकुमार का गहन ज्ञान
राजा घतकुमार ने शांत भाव से उत्तर दिया:
“वृथा है पश्चाताप, जो बदल नहीं सकता अतीत को। क्यों करूँ मैं चिंता, जो भविष्य को नियंत्रित नहीं कर सकती? जो होना था, वह हो चुका है, और जो होगा, वह समय के अनुसार घटित होगा।”
घतकुमार की इन गूढ़ और प्रभावशाली बातों से राजा वंक अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने घतकुमार को न केवल मुक्त कर दिया, बल्कि उसका राज्य भी लौटा दिया।किन्तु घतकुमार ने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। उन्होंने अपना राज्य अपने परिजनों को सौंप दिया और स्वयं संन्यासी बनकर अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़े।
शिक्षा
यह कथा सिखाती है कि धैर्य, समता और वैराग्य ही जीवन के सबसे बड़े धन हैं। जो व्यक्ति अतीत के पश्चाताप और भविष्य की चिंता से मुक्त होकर वर्तमान को स्वीकार करता है, वही सच्चे ज्ञान और शांति को प्राप्त करता है।