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Ukrainian family walked 125 km

125 किलोमीटर पैदल चला यूक्रेनी परिवार

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c शवों को सामूहिक कब्रों में दफनाया जा रहा है। रूसी सैनिक आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। लगातार बमबारी के बीच यूक्रेनी शहरों का बाकी दुनिया से संपर्क टूट गया है। इस बीच मारियुपोल शहर में फंसा एक परिवार अपनी जान बचाने के लिए 125 किलोमीटर पैदल चलकर जपोरिजिया पहुंचा।

रूसी सैनिक शहरों में मिसाइलें दाग रहे हैं। जहां भी आम नागरिकों ने शरण ली, वहां रूस ने हमले किया। रेलवे स्टेशन को भी नहीं छोड़ा। ऐसे में येवगेन और टेटियाना के पास अपने चार बच्चों को मौत के मुंह से बाहर निकालने का एक ही उपाय समझ आ रहा था। वो था किसी भी हाल में मारियुपोल छोड़ना। पूरा परिवार एक साथ पैदल ही निकल पड़ा।

हफ्तों तक रूसी सेना ने मारियुपोल को घेरा और अनगिनत बार हमले किए। तबाही के इस मंजर के बीच येवगेन और टेटियाना अपने बच्चों को मुसीबत का सामना करना सिखा रहे थे। टेटियाना कोमिसारोवा (40) ने बताया कि उनके 4 बच्चे हैं- यूलिया (6), अलेक्जेंडर (8), एना (10) और इवान (12)। टेटियाना ने कहा- हमले के डर से हम हफ्तों बंकर में छिपे रहे। करीब 2 हफ्तों तक हमने बच्चों को समझाया। उन्हें बताया की हमें जान बचाने के लिए भागना होगा। हमारा सफर मुश्किलों से भरा हो सकता है। मंजिल तक पहुंचने में समय भी लग सकता है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए ये किसी एडवेंचर की तरह था।

जंग शुरू होने के बाद यह पहली बार था जब, मन में डर और आंखों में उम्मीद लिए येवगेन और टेटियाना अपने बच्चों के साथ बंकर से निकले। येवगेन ने बताया कि जब वे बाहर निकले तो शहर खंडहर हो चुका था। उन्होंने कहा- जब बच्चों ने चारों ओर तबाही देखी तो वे सहम गए और चुपचाप बस पैदल चलते रहे। मुझे नहीं पता कि उनके दिमाग में क्या चल रहा था। वे क्या सोच रहे थे। शायद उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनका घर, शहर तबाह हो चुका है।

टेटियाना ने कहा- बंकर में छुपे लोग सिर्फ सर्वाइवल के बारे में सोच रहे थे। हमें दो वक्त की रोटी मिल जाए इतना ही काफी था। भोजन-पानी का इंतजाम करना कठिन जरूर था, लेकिन नामुमकिन नहीं। बमबारी से ज्यादा हमें भूख से मारने वाली बात सता रही थी। किसी तरह हम बच्चों के लिए कुछ किताबें लाए जिससे उनका ध्यान बमबारी की तरफ न जाए।
10 साल की एना ने बहादुरी दिखाते हुए कहा- जब बम गिरे तो हमें ज्यादा डर नहीं लगा। हम सभी बच्चे अंदर खेल रहे थे, लेकिन जब बिल्डिंग टूटने लगी तो सांस लेने में परेशानी होने लगी थी।

मुश्किल हालात के आगे नहीं झुके
येवगेन ने कहा- हम 5 दिन और 4 रात पैदल चले। इस दौरान कई रशियन चेक प्वाइंट आए जहां हमें रोका गया। हमारे मन में बस यही थी कि हमें बच्चों को सुरक्षित रखना है। रूसी सैनिकों ने हमसे कई सवाल किए, लेकिन हमें जाने दिया। 125 किलोमीटर पैदल चलने के बाद हमें मदद मिली। जपोरिजिया के पास एक व्यक्ति ने हमें लिफ्ट दी।

यह परिवार यूक्रेन में ही रहना चाहता है। उनका कहना है कि यूक्रेन उनका घर है और वे अपना पूरा जीवन यहां गुजारना चाहते हैं। साथ ही चाहते हैं कि जंग जल्द खत्म हो जाए और सभी लोग नॉर्मल लाइफ जी सकें।

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