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We don't beg for mercy, we only want justice - Dadabhai Naoroji

हम दया की भीख नहीं मांगते, हमें केवल न्याय चाहिए – दादाभाई नौरोजी

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नेशनल थॉट्स स्पेशल : आज दादा भाई नौरोजी का जन्मदिन है | दादाभाई नौरोजी को भारत में  ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ कहा जाता है | गोपाल कृष्ण गोखले और मोहनदास करमचंद गांधी के परामर्शदाता दादाभाई नौरोजी ना सिर्फ भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन के तौर पर जाने जाते हैं, बल्कि वह पहले ऐसे एशियाई व्यक्ति भी थे जिन्हें ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में सांसद चुना गया था | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को ब्रिटिश राज अधीन तत्कालीन बंबई में हुआ था |

 
कौन है दादाभाई नौरोजी ?

दादाभाई एक महान स्वतंत्रता संग्रामी थे, जिन्हें वास्तुकार के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी | दादाभाई एक पारसी थे, जो एक अच्छे शिक्षक, कपास के व्यापारी और एक प्रारंभिक भारतीय राजनीतिक और सामाजिक नेता थे | वह पहले भारतीय थे जो 1892 से 1895 के दौरान दादाभाई लिबरल पार्टी के सदस्य के तौर पर ब्रिटिश संसद के सदस्य रहे | ये पहले एशियाई थे, जो ब्रिटिश संसद के मेंबर बने थे | 
 
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रचयिता  
नौरोजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का रचयिता कहा जाता है | इन्होने ए ओ हुम और दिन्शाव एदुल्जी के साथ मिल कर इस पार्टी को बनाया था | दादाभाई इस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष भी रहे थे | दादाभाई पहले भारतीय थे, जो किसी कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए थे | 1906 में कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटिश सरकार से पहली बार स्वराज की मांग की थी, इस बात को सबसे पहले दादाभाई ही सबके सामने लाये थे |

जीवन परिचय
दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को बॉम्बे में एक गरीब पारसी परिवार में हुआ था | जब दादाभाई 4 साल के थे, तब इनके पिता नौरोजी पलंजी दोर्दी की मृत्यु हो गई थी | इनकी माता मानेक्बाई ने इनकी परवरिश की थी | पिता का हाथ उठने से, इस परिवार को बहुत सी आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा था | इनकी माता अनपढ़ थी, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को अच्छी अंग्रेजी शिक्षा देने का वादा किया था | दादाभाई को अच्छी शिक्षा देने में उनकी माता का विशेष योगदान था | दादाभाई की शादी 11 साल की उम्र में, 7 साल की गुलबाई से हो गई थी, उस समय भारत में बाल विवाह का चलन था | दादाभाई के 3 बच्चे थे, 1 बेटा एवं 2 बेटी |
 
शुरुआती शिक्षा 
दादाभाई की शुरुआती शिक्षा ‘नेटिव एजुकेशन सोसायटी स्कूल’ से हुई थी | इसके बाद दादाभाई ने ‘एल्फिनस्टोन इंस्टिट्यूशन’ बॉम्बे से पढाई थी, जहाँ इन्होने दुनिया का साहित्य पढ़ा था | दादाभाई गणित एवं अंग्रेजी में बहुत अच्छे थे | 15 साल की उम्र में दादाभाई को क्लेयर’स के द्वारा स्कॉलरशीप मिली थी |
 

दादाभाई नौरोजी करियर  –
  • दादाभाई एक पारसी पुरोहित परिवार से थे, इन्होने 1 अगस्त 1851 को ‘रहनुमाई मज्दायास्नी सभा’ का गठन किया था | इसका उद्देश्य यह था कि पारसी धर्म को एक साथ इकट्ठा किया जा सके | यह सोसायटी आज भी मुंबई में चलाई जा रही है |
  • इन्होने 1853 में फोर्थ नाईट पब्लिकेशन के तहत ‘रास्ट गोफ्तार’ बनाया था, जो आम आदमी की, पारसी अवधारणाओं को स्पष्ट करने में सहायक था |
  • 1855 में 30 साल की उम्र में दादाभाई को एल्फिनस्टोन इंस्टीट्यूशन में गणित एवं फिलोसोफी का प्रोफेसर बना दिया गया था | ये पहले भारतीय थे, जिन्हें किसी कॉलेज में प्रोफेसर बनाया गया था |
  • 1855 में ही दादाभाई ‘कामा एंड को’ कंपनी के पार्टनर बन गए, यह पहली भारतीय कंपनी थी, जो ब्रिटेन में स्थापित हुई थी | इसके काम के लिए दादाभाई लन्दन गए. दादाभाई लगन से वहाँ काम किया करते थे, लेकिन कंपनी के अनैतिक तरीके उन्हें पसंद नहीं आये और उन्होंने इस कंपनी में इस्तीफा दे दिया था |
  • 1859 में खुद की कपास ट्रेडिंग फर्म बनाया, जिसका नाम रखा ‘नौरोजी एंड को’  |
  • 1860 के दशक की शुरुआत में, दादाभाई ने सक्रिय रूप से भारतीयों के उत्थान के लिए काम करना शुरू किया था | वे भारत में ब्रिटिशों की प्रवासीय शासन विधि के सख्त खिलाफ थे |
 

क्या है ड्रेन थ्योरी ?
इन्होने ब्रिटिशों के सामने ‘ड्रेन थ्योरी’ प्रस्तुत की, जिसमें बताया गया था कि ब्रिटिश कैसे भारत का शोषण करते है, कैसे वो योजनाबद्ध तरीके से भारत के धन और संसाधनों में कमी ला रहे है, और देश को गरीब बना रहे है | इंग्लैंड में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद दादाभाई भारत वापस आ गए | 1874 में बरोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के संरक्षण में दादाभाई काम करने लगे | यहाँ से उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ, और वे महाराजा के दीवान बना दिए गए | इन्होने 1885 – 1888 के बीच में मुंबई की विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया था |

 

दादाभाई की मृत्यु कैसे हुई ? 

अंत के दिनों में दादाभाई अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर हुए शोषण पर लेख लिखा करते थे, साथ ही इस विषय पर भाषण दिया करते थे | दादाभाई नौरोजी ने ही भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की नींव की स्थापना की थी | 30 जून 1917 को 91 साल की उम्र में भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी का देहांत हो गया था |

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