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What is Panch Sanskar?

क्या होता है पञ्च संस्कार ?

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“ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रों यागश्च पंचम:”अर्थात – पञ्च संस्कार

नेशनल थॉट्स, दिल्ली ब्यूरो : पञ्च संस्कार (समाश्रयं), किसी मनुष्य को कैंकर्य (इस संसार और परम पद) के लिए तैयार करने की परिशोधक प्रक्रिया है, जो शास्त्रों में समझायी गयी है। यह श्लोक, पञ्च संस्कार के विभिन्न पक्षों को समझाता है – “ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रों यागश्च पंचम:”। इसके अंतर्गत निम्न पांच क्रियाओं का अनुसरण किया जाता है :

पञ्च संस्कार

  1. ताप – शंख चक्र लांचन – हमारे कन्धों/ बाहू पर शंख और चक्र की गर्म छाप। यह दर्शाता है कि हम भगवान की संपत्ति है –उसी प्रकार जैसे एक पात्र पर उसके स्वामी के चिह्न अंकित किये जाते है, हमें भगवान के चिन्हों से अंकित किया जाता है।
  2. पुण्ड्र (चिह्न) – द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – शरीर के द्वादश (12) स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र (तिरुमण और श्री चूर्ण) धारण करना।
  3. नाम – दास्य नाम – आचार्य द्वारा प्रदत्त नया दास्य नाम (रामानुज दास, मधुरकवि दास, श्री वैष्णव दास)।
  4. मंत्र – मंत्रोपदेश – आचार्य से रहस्य मंत्र का ज्ञान प्राप्त करना; मंत्र अर्थात वह जिसके ध्यान करने वाले को सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है – तिरुमंत्र, द्वयं और चरम श्लोक जो हमें संसार से मुक्ति प्रदान करते है।
  5. याग – देव पूजा – तिरुवाराधना/ पूजा विधि का ज्ञान प्राप्त करना।
 
 
पञ्च संस्कार
धारण करने के लिए योग्यतायें :- पञ्च संस्कार

अकिंचयम् (स्वयं को पूर्णतः असमर्थ/ अयोग्य/ अपात्र मानना) और अनन्य गतित्व (और कोई गति न होना), ये दो मुख्य शर्तें है, जो भगवान के प्रति समर्पण करने से पूर्व होना आवश्यक है। मात्र इसी स्थिति में, वह संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित हो सकेगा और भगवान द्वारा स्वयं के उद्धार के लिए आश्वस्त होगा।

पञ्च संस्कार

पञ्च संस्कार के उद्देश्य – पञ्च संस्कार

जैसा की शास्त्र कहते है, “तत्व ज्ञानान् मोक्ष लाभ:” अर्थात ब्रह्म के विषय में सच्चा ज्ञान प्राप्त करके ही, मोक्ष प्राप्त होता है। आचार्य से अमूल्य अर्थ पंचक (ब्रह्मं – भगवान, जीवात्मा – आत्मा, उपाय – भगवान को प्राप्त करने के साधन, उपेय – लक्ष्य / परिणाम, विरोधी – उन लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली बाधाएं), जो मंत्र उपदेश का अंग है, के विषय में ज्ञान प्राप्त करके, हम चरम लक्ष्य अर्थात नित्य विभूति में श्रिय:पति के प्रति कैंकर्य, को प्राप्त करने के योग्य बन सकेंगे। 

पञ्च संस्कार
सच्चा ज्ञान अर्थात भगवान के प्रति समर्पित होना – पञ्च संस्कार
 
सच्चा ज्ञान यह स्वीकार करना है कि हम संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित/ आश्रित है। अपने आचार्य और श्रीवैष्णवों (अनेकों प्रकार से) के प्रति कैंकर्य करते रहना और अर्चावतार भगवान का घर में तिरुवाराधन द्वारा और दिव्य देशों में कैंकर्य करते रहना ही इस जीवन का उद्देश्य है। इस महान सन्देश को अन्य लोगों में उनके आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रचार करना भी महत्वपूर्ण है। 
 
पञ्च संस्कार
 
आचार्य की परिभाषा – पञ्च संस्कार
 
श्रीरामानुज स्वामीजी, अपने मुख्य उपदेशों में, प्रथम हमें श्रीभाष्य, तिरुवाय्मौली सीखने और अन्य को भी सिखाने का आदेश करते है। यहाँ, जीवात्मा और परमात्मा से दिव्य मिलन का प्रबंध आचार्य करते है। यद्यपि हमें समय-समय पर प्रपन्न भी कहा जाता है, परंतु सच्चे संदर्भ में, श्रीरामानुज स्वामीजी और हमारे सभी पूर्वाचार्यों ने हमें समझाया है कि हम आचार्य निष्ठ है अर्थात जो संपूर्णतः आचार्य को समर्पित/ आश्रित है।
पञ्च संस्कार
श्रीवैष्णवता का सिद्धांत – पञ्च संस्कार
 
इस पञ्च संस्कार विधि को जीवात्मा के लिए सच्चा जन्म भी कहा जाता है, क्योंकि इसी समय, जीवात्मा अपने सच्चे स्वरूप के विषय में ज्ञान प्राप्त करती है और भगवान के प्रति संपूर्ण समर्पण करती है। इसलिए जैसा की यहाँ समझाया गया है, इस लौकिक संसार को त्याग कर, नित्य परम पद जाकर श्रिय:पति (श्रीमन्नारायण भगवान) के प्रति अनवरत कैंकर्य करना ही श्रीवैष्णवता का सिद्धांत है।

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