जब विकास की रफ्तार तेज होती है, तो अक्सर पुरानी इमारतें रास्ते से हट जाती हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ मकान ‘कील’ की तरह अपनी जगह अड़ जाते हैं, जिससे सरकार और इंजीनियरों को रास्ता बदलना पड़ता है। चीन के ‘नेल हाउस’ की तरह अब उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में भी ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट को चुनौती दे दी है।
क्या है ‘नेल हाउस’ का कॉन्सेप्ट
‘नेल हाउस’ उस मकान को कहा जाता है जो विकास परियोजना के बीच हटने से इनकार कर देता है। चीन के जियांग्शी प्रांत में ये युशौ ने हाईवे के लिए अपना घर देने से मना कर दिया था। नतीजतन, सड़क उनके घर के चारों ओर बनानी पड़ी।
हालांकि बाद में उन्हें पछताना पड़ा, क्योंकि शोर और प्रदूषण के बीच उनका घर रहने लायक नहीं बचा।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे: ड्रीम प्रोजेक्ट
213 किलोमीटर लंबा दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे दिल्ली से देहरादून की दूरी को 6 घंटे से घटाकर करीब 2–2.5 घंटे करने वाला प्रोजेक्ट है। लगभग 12–13 हजार करोड़ रुपये की लागत वाला यह छह-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर है, जिसमें कई पुल, इंटरचेंज और सुविधाएं शामिल हैं।
गाजियाबाद का ‘नेल हाउस’
गाजियाबाद के मंडोला इलाके में करीब 1,600 वर्ग मीटर में बना एक दो-मंजिला मकान इस एक्सप्रेसवे के बीच अड़कर खड़ा है। यह जमीन विवाद 1998 से चल रहा है।
मकान के मालिक स्वर्गीय डॉ. वीरसेन सरोहा ने जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अदालत का रुख किया था। अब उनके पोते लक्ष्यवीर सरोहा इस मामले को आगे बढ़ा रहे हैं।
कानूनी लड़ाई और कोर्ट का आदेश
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ‘यथास्थिति’ बनाए रखने का आदेश दिया।
इसका मतलब है कि न तो मकान तोड़ा जा सकता है और न ही कोई नया निर्माण किया जा सकता है।
मुआवज़े को लेकर विवाद
सरकार ने पहले 1,100 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा देने की पेशकश की थी, जिसे सरोहा परिवार ने ठुकरा दिया। अब परिवार की मांग है कि मौजूदा बाजार दर के हिसाब से मुआवज़ा दिया जाए।
जमीन के बीच खड़ा ‘स्वाभिमान’
मकान चारों तरफ से एक्सप्रेसवे से घिर चुका है। सुरक्षा गार्ड के अनुसार, ट्रैफिक और शोर के कारण वहां रहना मुश्किल हो गया है।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि मामला कोर्ट में होने के कारण वे फिलहाल कुछ नहीं कर सकते।
चीन से मिला सबक
चीन के ‘नेल हाउस’ का उदाहरण बताता है कि लंबे समय तक विरोध कभी-कभी नुकसानदेह भी साबित हो सकता है। वहां के मालिक को न बेहतर मुआवज़ा मिला और न ही रहने लायक माहौल बचा।
आगे क्या होगा?
गाजियाबाद का यह ‘नेल हाउस’ अब विकास और स्वाभिमान की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।
अब देखना यह है कि अदालत का फैसला किसके पक्ष में जाता है—तेज रफ्तार विकास या अपनी जमीन पर अडिग खड़ा स्वाभिमान।