पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम और मणिपुर से जुड़े ब्नेई मेनाशे समुदाय के लगभग 250 लोग इजराइल पहुँच गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समूह शुक्रवार तड़के बेन गुरियन हवाई अड्डा पर उतरा, जहां उनका भव्य स्वागत किया गया। यह वही पहला दल है, जिसे पिछले साल इजराइली सरकार के फैसले के बाद बसाने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
हवाई अड्डे पर भावुक स्वागत
इजराइल पहुंचते ही इन लोगों का जोरदार स्वागत किया गया। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे समुदाय के सदस्यों का स्वागत वहां पहले से रह रहे लोगों और शुभचिंतकों ने इजराइली झंडे लहराकर किया। धार्मिक गीतों और परंपराओं ने माहौल को और भी भावुक बना दिया।
पहुंचते ही मिली नागरिकता
समूह के सदस्य चाविमावी के अनुसार, इजराइल पहुंचते ही उन्हें नागरिकता प्रदान कर दी गई। फिलहाल इन लोगों को उत्तरी इजराइल के नासरत क्षेत्र में बसाया जाएगा, जहां उनके रहने की व्यवस्था की गई है। आने वाले दिनों में और भी लोग दिल्ली और मणिपुर से इजराइल के लिए रवाना होंगे।
कौन हैं ब्नेई मेनाशे समुदाय
ब्नेई मेनाशे समुदाय खुद को प्राचीन इजराइली जनजाति ‘मेनाशे’ का वंशज मानता है। उनकी मान्यता के अनुसार, उनके पूर्वज पश्चिम एशिया से फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होते हुए पूर्वोत्तर भारत पहुंचे थे।
हालांकि समय के साथ कई लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए, फिर भी उन्होंने अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखा।
धार्मिक प्रक्रिया भी जरूरी
इजराइल पहुंचने के बाद इन लोगों को औपचारिक रूप से यहूदी धर्म में पुनः दीक्षित किया जाएगा। यह प्रक्रिया वहां नागरिकता और समाज में पूर्ण रूप से शामिल होने के लिए आवश्यक मानी जाती है।
2030 तक हजारों लोगों को बसाने की योजना
इजराइल सरकार ने 2030 तक करीब 6,000 ब्नेई मेनाशे लोगों को बसाने की योजना बनाई है। वर्ष 2026 में ही लगभग 1,200 लोगों को लाने का लक्ष्य रखा गया है। इस मिशन में कई सरकारी संस्थाएं और संगठन मिलकर काम कर रहे हैं, जिनमें आव्रजन और एकीकरण मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और यहूदी एजेंसी शामिल हैं।
चयन प्रक्रिया कैसे हुई
समुदाय के लोगों का चयन एक विशेष प्रक्रिया के तहत किया गया। पिछले साल दिसंबर में रब्बियों का एक दल आइजोल पहुंचा, जहां कई हफ्तों तक जांच के बाद लोगों का चयन किया गया।
2005 में एक प्रमुख धार्मिक मान्यता मिलने के बाद इस समुदाय के इजराइल जाने का रास्ता साफ हुआ।
पहचान और आस्था की यात्रा
यह केवल एक प्रवास नहीं, बल्कि पहचान और आस्था से जुड़ी एक बड़ी यात्रा है। ब्नेई मेनाशे समुदाय के लिए यह अपने मूल से जुड़ने का अवसर है, जबकि इजराइल के लिए यह अपने ऐतिहासिक समुदायों को वापस लाने की पहल है।
हालांकि, इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।