Delhi High Court ने स्पष्ट किया है कि पालतू जानवरों की कस्टडी को बेजान वस्तुओं की तरह नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जानवर और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के भावनात्मक जुड़ाव को पूरी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
“जानवर भी रखते हैं भावनाएं”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जानवर भी संवेदनशील जीव होते हैं और अपने देखभाल करने वालों के साथ गहरा रिश्ता बना लेते हैं। उन्हें अलग करने से जानवरों को मानसिक और भावनात्मक आघात पहुंच सकता है, इसलिए कस्टडी विवादों में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कुत्तों की कस्टडी का मामला
यह मामला तीन पालतू कुत्तों—मिष्टी, कोको और कॉटन—की कस्टडी को लेकर था। ट्रायल कोर्ट ने पहले उन्हें ‘सुपरदारी’ पर असली मालिक को लौटाने का आदेश दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इस पर पुनर्विचार किया।
सुपरदारी का मतलब है कि कोर्ट द्वारा जब्त संपत्ति को अस्थायी रूप से किसी व्यक्ति को सौंपना।
समझौते के आधार पर फैसला
अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को मान्यता दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीनों कुत्तों को याचिकाकर्ताओं को वापस सौंपा जाए, लेकिन कुछ शर्तों के साथ—जैसे जरूरत पड़ने पर उन्हें कोर्ट में पेश करना।
साथ ही, कोर्ट ने कहा कि यदि असली मालिक भविष्य में बरी होता है, तो जानवरों के हित को ध्यान में रखते हुए कस्टडी पर दोबारा विचार किया जा सकता है।
“कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” टिप्पणी
एक अन्य मामले में, दिल्ली हाई कोर्ट ने पड़ोसियों के बीच दर्ज क्रॉस-FIR को रद्द कर दिया। यह विवाद कुत्तों को टहलाने के दौरान शुरू हुआ था और बाद में मारपीट तक पहुंच गया।
कोर्ट ने इसे निजी विवाद बताते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कानूनी कार्यवाही जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।
बदलता नजरिया
इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि अब पालतू जानवरों की कस्टडी को सिर्फ संपत्ति विवाद नहीं माना जाएगा, बल्कि इसमें उनके भावनात्मक और मानसिक कल्याण को भी बराबर महत्व दिया जाएगा।