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जितिया व्रत 2026: निर्जला उपवास के बाद प्रदोष काल में ऐसे करें पूजा

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admin
3 अक्टूबर 2026 | 10:33 am IST
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आज यानी 3 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, श्रद्धा और आस्था के साथ रखा जा रहा है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।

जितिया व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं जितिया व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व।

जितिया व्रत की तिथि और मुहूर्त

जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह 7:59 बजे शुरू हुई और 4 अक्टूबर की सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि और प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए 3 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत किया जा रहा है।

इससे पहले 2 अक्टूबर को नहाय-खाय की परंपरा पूरी की गई। आज माताएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। इसके बाद 4 अक्टूबर को व्रत का पारण किया जाएगा।

प्रदोष काल में करें जितिया व्रत की पूजा

जितिया व्रत में शाम के समय प्रदोष काल में पूजा करने का विशेष महत्व माना गया है। आज शाम करीब 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक पूजा का शुभ समय बताया गया है।

इस दौरान महिलाएं घर के आंगन या पूजा स्थल पर छोटा प्रतीकात्मक पोखर बनाती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। इसके बाद जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है और अंत में आरती कर संतान की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

भगवान जीमूतवाहन की कथा का विशेष महत्व

जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने का विशेष धार्मिक महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने का संकल्प लिया था। उनकी करुणा, त्याग और परोपकार की भावना से जुड़ी कथा को जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

संतान की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है व्रत

धार्मिक मान्यता है कि जितिया व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है। इसी विश्वास के साथ माताएं निर्जला व्रत रखती हैं, भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं।