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कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला: SC-ST आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून के प्रावधान रद्द

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admin
13 अक्टूबर 2026 | 09:49 am IST
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के आरक्षण में बढ़ोतरी से जुड़े 2022 के राज्य कानून के प्रावधानों को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरक्षण की बढ़ी हुई व्यवस्था कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करती है। इस फैसले का असर राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था पर पड़ सकता है।

मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा की पीठ ने सोमवार को कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

SC और ST का आरक्षण बढ़ाने का था प्रावधान

कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2022 में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत करने का प्रावधान किया था।

इस कानून के तहत SC, ST और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 56 प्रतिशत कर दिया गया था। यह कानून तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था।

विधेयक को 11 जनवरी 2023 को राज्यपाल की मंजूरी मिली और अगले दिन, 12 जनवरी 2023 को इसे कर्नाटक राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किए कानून के प्रावधान?

हाईकोर्ट ने कहा कि कर्नाटक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीट और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022 की धारा-3 संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है, क्योंकि इसके तहत कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक हो जाता है।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि धारा-3 को उस सीमा तक निरस्त किया जाता है, जहां तक इसके तहत कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक होता है।

इसके अलावा, अदालत ने कानून की धारा-4 को भी रद्द कर दिया। इस धारा में राज्य सरकार की सेवाओं में SC और ST के लिए आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान था। पीठ ने इसे असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है।

क्या है आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा?

आरक्षण की 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का आधार सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 1992 का ऐतिहासिक इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार फैसला है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। बाद के कई फैसलों में भी इस सीमा को बरकरार रखा गया है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इसी संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए आरक्षण बढ़ाने वाले कानून के संबंधित प्रावधानों को निरस्त किया।

जी. परमेश्वर ने फैसले को बताया गंभीर घटनाक्रम

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने SC और ST के आरक्षण में बढ़ोतरी को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को गंभीर घटनाक्रम बताया। उन्होंने कहा कि इसका राज्य में सामाजिक न्याय, शैक्षणिक अवसरों और सरकारी नौकरियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

परमेश्वर ने कहा कि राज्य सरकार न्यायपालिका और उस संवैधानिक ढांचे का सम्मान करती है, जिसके तहत वह काम करती है। हालांकि, उन्होंने इस फैसले को लेकर पूर्ववर्ती BJP सरकार की राजनीतिक जवाबदेही और केंद्र की BJP-नीत सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

फैसले का आगे क्या हो सकता है असर?

हाईकोर्ट के इस फैसले से कर्नाटक में SC और ST के लिए बढ़ाए गए आरक्षण की व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इसके व्यावहारिक प्रभाव और आगे की कानूनी प्रक्रिया की स्थिति संबंधित आदेशों तथा सरकार की अगली कार्रवाई पर निर्भर करेगी।

फिलहाल, अदालत ने 2022 के कानून के उन प्रावधानों को रद्द किया है, जिनके तहत आरक्षण की सीमा बढ़ाई गई थी और सरकारी सेवाओं में SC-ST आरक्षण में वृद्धि का प्रावधान किया गया था।