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सावन 2026: पहले सोमवार पढ़ें यह व्रत कथा, बरसेगी शिव कृपा

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admin
03 अगस्त 2026 को 05:16 am बजे
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Sawan Somvar Vrat Katha: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। इस पूरे मास में आने वाले प्रत्येक सोमवार का विशेष महत्व होता है, लेकिन पहला सावन सोमवार सबसे अधिक शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करने के साथ यदि सावन सोमवार व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण किया जाए तो भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। शिव पुराण और लोक परंपराओं में भी सोमवार व्रत और कथा के महत्व का उल्लेख मिलता है।

सावन सोमवार व्रत कथा का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन सोमवार का व्रत केवल उपवास रखने तक सीमित नहीं है। इस दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक कर उन्हें बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग, गंगाजल और शुद्ध जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद श्रद्धा के साथ व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना पूजा का अनिवार्य अंग माना गया है। मान्यता है कि कथा सुने बिना सोमवार का व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए पूजा के समापन पर पूरे परिवार के साथ व्रत कथा अवश्य पढ़ी या सुनी जाती है।

संतान की इच्छा में शिवभक्ति करने वाला साहूकार

प्राचीन समय में एक नगर में एक धनवान और धर्मपरायण साहूकार रहता था। उसके पास धन-वैभव की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने का दुख उसे हमेशा सताता रहता था। संतान प्राप्ति की कामना से वह प्रत्येक सोमवार भगवान शिव का व्रत रखता, शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करता तथा पूरी श्रद्धा से भोलेनाथ की आराधना करता था।

उसकी अटूट भक्ति देखकर माता पार्वती प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान शिव से साहूकार को संतान का सुख देने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने कहा कि उसके भाग्य में पुत्र तो है, लेकिन उसकी आयु केवल बारह वर्ष होगी। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया।

पुत्र के बारहवें वर्ष की चिंता

कुछ समय बाद साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। पूरे परिवार में खुशियां छा गईं, लेकिन साहूकार को भगवान शिव का वरदान याद था। जैसे-जैसे बालक बड़ा हुआ, पिता की चिंता भी बढ़ती गई।

जब पुत्र ग्यारह वर्ष का हुआ तो साहूकार ने अपने भाई से कहा कि उसे काशी भेज दिया जाए, ताकि वह वेद-शास्त्रों का अध्ययन कर सके। साथ ही उसने यह भी कहा कि यात्रा के दौरान जहां भी यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान हों, वहां ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा अवश्य दी जाए।

राजकुमारी के विवाह में हुआ चमत्कार

काशी जाते समय वे एक ऐसे नगर पहुंचे जहां राजा की पुत्री का विवाह होना था। जिस राजकुमार से विवाह तय हुआ था, वह एक आंख से काना था। राजा नहीं चाहता था कि यह बात विवाह के समय सामने आए।

राजा ने साहूकार के भाई से अनुरोध किया कि कुछ समय के लिए उसके भतीजे को वर के रूप में मंडप में बैठा दिया जाए। परिस्थितियों को देखते हुए उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

विवाह की सभी रस्में पूरी होने के बाद उस बालक ने चुपचाप राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया कि वह वास्तविक वर नहीं है। जब राजकुमारी ने यह संदेश पढ़ा तो उसने पूरी बात अपने माता-पिता को बता दी। सत्य सामने आने पर राजा ने वास्तविक वर के साथ बेटी की विदाई करने से इनकार कर दिया। इसके बाद साहूकार के भाई और बालक का सम्मानपूर्वक सत्कार किया गया और वे काशी की ओर रवाना हो गए।

काशी में पूरी हुई बारह वर्ष की आयु

काशी पहुंचकर बालक ने वेद-शास्त्रों का अध्ययन शुरू किया। समय बीतता गया और उसका बारहवां वर्ष पूरा होने का समय आ गया। उस दिन भी उसके मामा ने ब्राह्मणों को भोजन कराया, यज्ञ कराया और भगवान शिव का पूजन किया।

इसी दौरान बालक को अचानक असहनीय पीड़ा हुई और कुछ ही क्षणों में उसने प्राण त्याग दिए। मामा अत्यंत दुखी हुए, लेकिन पहले उन्होंने यज्ञ की पूर्णाहुति कराई और फिर विलाप करने लगे।

माता पार्वती की प्रार्थना से पिघले भगवान शिव

उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहां से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने रोने की आवाज सुनकर कारण पूछा। जब उन्होंने देखा कि यह वही साहूकार का पुत्र है, तब उनका हृदय द्रवित हो उठा।

उन्होंने भगवान शिव से कहा, “प्रभु, इस बालक के माता-पिता आपकी सच्चे मन से भक्ति करते हैं। यदि यह जीवित न रहा तो वे जीवनभर दुखी रहेंगे।”

माता पार्वती की करुणा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने बालक पर अपनी कृपा दृष्टि डाली। उनके आशीर्वाद से बालक पुनः जीवित हो गया और उसकी आयु भी बढ़ गई। यह चमत्कार देखकर वहां उपस्थित सभी लोग भगवान शिव और माता पार्वती की जय-जयकार करने लगे।

सकुशल घर लौटा साहूकार का पुत्र

शिक्षा पूरी करने के बाद बालक अपने मामा के साथ घर लौट आया। उधर साहूकार और उसकी पत्नी यह मान चुके थे कि उनके पुत्र की आयु पूरी हो चुकी होगी। जब उन्होंने अपने पुत्र को जीवित और स्वस्थ देखा तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।

दोनों ने भगवान शिव और माता पार्वती का आभार व्यक्त किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा-अर्चना की।

व्रत कथा से मिलती है भगवान शिव की कृपा

धार्मिक मान्यता है कि तभी से सावन सोमवार के व्रत के साथ इस कथा का पाठ और श्रवण करने की परंपरा चली आ रही है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु पूरे विश्वास और भक्ति के साथ सावन सोमवार का व्रत रखते हैं तथा इस कथा का पाठ करते हैं, उन पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।