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आज की कहानी:गुरु की चुप्पी और शिष्य की समझ

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admin
31 जुलाई 2026 को 05:37 am बजे
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प्राचीन समय की यह लोककथा गुरु–शिष्य परंपरा की गहराई और उसके वास्तविक अर्थ को समझाने वाली है, एक नगर में एक गुरु और उनका शिष्य मूर्तियाँ बनाने का कार्य करते थे और उन्हीं मूर्तियों को बेचकर अपना जीवन यापन करते थे, गुरु अनुभवी थे और शिष्य युवा, समय के साथ शिष्य की कला निखरने लगी और उसकी बनाई मूर्तियाँ लोगों को अधिक पसंद आने लगीं, उसकी मूर्तियाँ अधिक दामों में बिकने लगीं, जबकि गुरु की मूर्तियों की कीमत अपेक्षाकृत कम मिलने लगी, यह देखकर शिष्य के मन में धीरे-धीरे यह भाव आने लगा कि वह अपने गुरु से भी श्रेष्ठ मूर्तिकार बन गया है, उसे अपनी कला पर गर्व होने लगा जो आगे चलकर घमंड में बदल गया, वहीं गुरु प्रतिदिन उसे प्रेमपूर्वक यही कहते कि बेटा, काम और मन लगाकर, अधिक सफाई और धैर्य से करो, तुम्हारी मूर्तियों में अभी भी कुछ कमियाँ हैं।

गुरु की यह बात शिष्य को चुभने लगी, उसे लगने लगा कि गुरु उसकी बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्या करने लगे हैं, इसलिए बार-बार उसे टोकते रहते हैं, जब कई दिनों तक गुरु ने उसे सुधार की सलाह दी तो एक दिन शिष्य का धैर्य टूट गया और उसने आवेश में आकर कह दिया कि गुरुजी, मेरी मूर्तियाँ आपसे अधिक दाम में बिकती हैं, लोग मेरी कला की प्रशंसा करते हैं, फिर भी आप मुझे ही सुधारने को क्यों कहते हैं, यह सुनकर गुरु समझ गए कि शिष्य अहंकार के मार्ग पर चल पड़ा है।

गुरु ने बिना क्रोध किए शांत स्वर में कहा कि बेटा, जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब मेरी मूर्तियाँ भी मेरे गुरु की मूर्तियों से अधिक दाम में बिकती थीं और एक दिन मैंने भी उन्हीं शब्दों में अपने गुरु से प्रश्न किया था,उस दिन के बाद मेरे गुरु ने मुझे सलाह देना बंद कर दिया, उन्होंने सोचा कि जब शिष्य स्वयं को पूर्ण समझने लगे तो उसे सीख की आवश्यकता नहीं, परिणाम यह हुआ कि मेरी कला वहीं ठहर गई, मैं आगे नहीं बढ़ सका, आज मैं जो भी हूँ, अपनी उसी भूल के कारण हूँ, मैं नहीं चाहता कि तुम भी वही गलती दोहराओ जो मैंने की थी, गुरु की यह बात शिष्य के हृदय को छू गई, उसे अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ, उसने तुरंत गुरु के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और निश्चय किया कि वह अहंकार का त्याग कर गुरु की हर सीख को आदरपूर्वक अपनाएगा, इसके बाद शिष्य ने पहले से अधिक लगन, विनम्रता और धैर्य से कार्य करना शुरू किया, गुरु के मार्गदर्शन से उसकी कला निरंतर निखरती गई और समय के साथ उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई, तब शिष्य को समझ आया कि गुरु का कार्य प्रशंसा करना नहीं बल्कि शिष्य को श्रेष्ठ बनाना होता है।

शिक्षा:
गुरु वही है जो शिष्य की कमियाँ दिखाए और शिष्य वही है जो उन्हें स्वीकार कर आगे बढ़े; अहंकार सीख को रोक देता है, विनम्रता सफलता का द्वार खोलती है।