National Thoughts Logo
National Thoughts
AWebPortalOfPositiveJournalism

कश्मीरी पंडितों पर फिर खतरा? LeT की कथित 7000 नामों वाली हिट-लिस्ट से सनसनी

a
admin
09 सितंबर 2026 को 06:06 am बजे
Featured Image

कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को कथित तौर पर मिल रही लगातार धमकियों ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्वास नीति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़े होने का दावा करने वाले संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC/ULF) की ओर से जारी कथित धमकी भरे पत्रों में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज (PM Package) के तहत घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाने की चेतावनी दी गई है।

बताया जा रहा है कि एक महीने से भी कम समय में इस तरह की कम से कम पांच धमकियां सामने आई हैं। कथित पत्रों में कर्मचारियों से सरकारी नौकरी छोड़ने की मांग की गई है और ऐसा नहीं करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई है।

1990 के दशक की याद दिला रही धमकियां

कश्मीरी पंडित समुदाय के कुछ लोगों ने मौजूदा घटनाक्रम की तुलना 1990 के दशक के दौर से की है। मुंबई में रह रहे एक विस्थापित कश्मीरी पंडित ने कहा कि उस समय भी आतंकियों की ओर से धमकी भरी सूचियां और संदेश जारी किए जाते थे। अंतर केवल इतना है कि उस दौर में सोशल मीडिया और इंटरनेट मौजूद नहीं थे।

समुदाय से जुड़े लोगों का आरोप है कि इस बार कथित तौर पर निजी फोन नंबर, घर के पते और वाहनों के रजिस्ट्रेशन जैसी जानकारी ऑनलाइन साझा की गई है। यदि ये दावे सही पाए जाते हैं, तो इससे कर्मचारियों की व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

निजी जानकारी लीक होने का दावा

7 सितंबर को X पर एक पोस्ट में समुदाय की आवाज के रूप में सक्रिय सबा कौल ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर सुरक्षा संकट बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि ULC ने PM Package के तहत कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को सीधे तौर पर धमकी दी है।

कौल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से मामले की जांच कराने और घाटी में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जांच इस मामले में अहम मानी जा रही है।

एक्टिविस्ट ने दर्ज कराई शिकायत

PM Package कर्मचारियों से जुड़े एक्टिविस्ट राकेश हांडू ने भी इन धमकियों को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने 6 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और J&K पुलिस की साइबर क्राइम विंग को शिकायत भेजकर कथित धमकी पत्र के मामले में FIR दर्ज करने की मांग की।

हांडू के मुताबिक, कथित पत्र में बाहरी राज्यों से आए कर्मचारियों को भी निशाना बनाने की चेतावनी दी गई है। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से धमकी के स्रोत की जांच करने और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

क्या है कश्मीरी पंडितों का PM Package?

कश्मीरी प्रवासियों के पुनर्वास के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 2008 में रोजगार पैकेज की शुरुआत की थी। इसके तहत जम्मू-कश्मीर सरकार में कश्मीरी प्रवासियों के लिए नौकरियों का प्रावधान किया गया।

बाद में नवंबर 2015 में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत अतिरिक्त सरकारी पदों को मंजूरी दी। इन योजनाओं का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर घाटी में उनकी वापसी और पुनर्वास को प्रोत्साहित करना था।

हालांकि, मौजूदा धमकियों के बीच कर्मचारियों की सुरक्षा इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है।

धमकियों की बढ़ती घटनाओं से चिंता

पिछले कुछ सप्ताह में कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों को कथित तौर पर कई धमकी भरे संदेश मिलने की बात सामने आई है। 1 सितंबर को भी ULC की ओर से कथित तौर पर एक पत्र जारी किए जाने की बात कही गई थी।

इसके अलावा 7 अगस्त को सामने आए एक कथित धमकी पत्र में कश्मीरी पंडित अधिकारियों, उनके परिवारों और काम करने के स्थानों की जानकारी होने का दावा किया गया था। कथित पत्र में जम्मू चले जाने पर भी निशाना बनाए जाने की धमकी का उल्लेख किया गया था।

इन घटनाओं के बाद समुदाय के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

ट्रांजिट आवास की सुरक्षा पर भी सवाल

राकेश हांडू ने कश्मीर के कुछ इलाकों में PM Package कर्मचारियों के लिए बनाए गए ट्रांजिट आवासों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ आवास अपेक्षाकृत सुनसान इलाकों में हैं और वहां सड़क, ड्रेनेज, फेंसिंग तथा पर्याप्त सुरक्षा जैसी सुविधाओं की कमी है। उन्होंने ट्रांजिट कॉलोनियों और किराए के मकानों का तत्काल सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग की है।

उनका कहना है कि कर्मचारियों को सिर्फ नौकरी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित आवास और सुरक्षित कार्यस्थल भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

1990 के पलायन की यादें फिर ताजा

कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा का मुद्दा 1990 के दशक के विस्थापन से गहराई से जुड़ा है। उस समय घाटी में बढ़ती हिंसा, लक्षित हत्याओं और धमकियों के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपने घर छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में जाना पड़ा था।

इसके बाद सरकारों ने अलग-अलग स्तर पर पुनर्वास और रोजगार योजनाओं के जरिए समुदाय की घाटी में वापसी को प्रोत्साहित करने की कोशिश की।

लेकिन समय-समय पर होने वाली आतंकी घटनाएं और धमकियां इस पुनर्वास प्रक्रिया के सामने सुरक्षा की चुनौती खड़ी करती रही हैं।

राहुल भट की हत्या ने बढ़ाई चिंता

मई 2022 में चाडूरा तहसील कार्यालय में कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट की हत्या ने घाटी में काम कर रहे अल्पसंख्यक कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी थी।

यह घटना उन कर्मचारियों के लिए बड़ा झटका थी, जो रोजगार के माध्यम से घाटी में लौटकर सामान्य जीवन शुरू करने की कोशिश कर रहे थे।

धमकियों पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज

कथित आतंकी धमकियों के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस भी तेज हुई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने धमकियों को लेकर सवाल उठाए और प्रशासन की भूमिका पर टिप्पणी की।

बीजेपी ने उनके बयान को खारिज करते हुए उन पर कश्मीरी हिंदुओं की पीड़ा को कम करके आंकने का आरोप लगाया।

वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने धमकियों को गंभीरता से लेने और सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों से इनके स्रोत का पता लगाने की जरूरत पर जोर दिया है।

सुरक्षा और पुनर्वास के बीच बड़ी चुनौती

मौजूदा घटनाक्रम ने सरकार के सामने एक अहम चुनौती खड़ी कर दी है। कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास केवल सरकारी नौकरियां देने या आवास उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह सकता। इसके साथ कर्मचारियों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

आखिरकार, पुनर्वास की सफलता का वास्तविक पैमाना यही होगा कि घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारी खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं और बिना भय के वहां रहकर अपना काम कर पाते हैं।