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आज की कहानी:संस्कृती और संस्कार

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“मम्मी मैंने तुमसे हजार बार कहा है- कि चिंटू (आरव) के सामने अपनी ये गंवारी भाषा मत बोला करो।
कल उसका ‘इंटरनेशनल स्कूल’ में इंटरव्यू है।
अगर उसने वहां जाकर ‘कांई है, ‘कांई हाल हे’ या “जयश्रीकृष्ण””जय श्री राम ” बोल दिया न, तो मेरी नाक कट जाएगी।
तुम्हें पता है वहां डोनेशन देकर भी एडमिशन नहीं मिलता है सिर्फ स्टेटस और क्लास देखी जाती है।”
पवन ने अपनी माँ, गुणमाला देवी पर झुंझलाते हुए कहा।
गुणमाला देवी, जो गांव से आई थीं और शुद्ध देसी बोली बोलती थीं, बेटे की डांट सुनकर चुप हो गईं। उन्होंने अपनी पोटली में से जो लड्डू निकाले थे, उन्हें वापस अंदर रख लिया।
उनका मन था कि पोते को अपने हाथ के बने लड्डू खिलाएं और ढेर सारा आशीर्वाद दें । लेकिन बेटे के ‘स्टेटस’ के आगे उनकी ममता सहम गई।
पवन और उसकी पत्नी, रिया, अपने पांच साल के बेटे आरव (चिंटू) को पिछले एक महीने से तोते की तरह रटा रहे थे।
“से हेलो,” “से गुड मॉर्निंग,” “माय नेम इज़ आरव।”

घर का माहौल ऐसा था जैसे कोई मिलिट्री ट्रेनिंग चल रही हो। गुणमाला देवी को सख्त हिदायत थी कि जब तक आरव का इंटरव्यू न हो जाए, वो उससे दूर ही रहें, ताकि उनकी ‘देहाती’ भाषा का असर बच्चे की ‘क्लास’ पर न पड़े।

अगले दिन सुबह, पवन, रिया और आरव स्कूल पहुंचे। शहर का सबसे प्रतिष्ठित स्कूल, जहाँ अमीरों की लंबी कतारें लगी थीं।
हर कोई इंग्लिश में बात कर रहा था।
पवन और रिया नर्वस थे। तभी उनका नंबर आया।
प्रिंसिपल का केबिन बहुत बड़ा था। प्रिंसिपल एक सख्त मिजाज के व्यक्ति माने जाते थे।
उन्होंने आरव से अंग्रेजी में नाम पूछा, रंगों के नाम पूछे। आरव ने रटे-रटाए जवाब दे दिए।
पवन और रिया के चेहरे पर मुस्कान थी। सब कुछ प्लान के मुताबिक हो रहा था।
तभी मिस्टर प्रिंसीपल ने अपनी पेन नीचे रखी और आरव की आँखों में देखकर पूछा: “बेटा, जब आपके घर में कोई बड़ा मेहमान आता है या आप अपने दादा-दादी से मिलते हो तो सबसे पहले क्या करते हो ?”

पवन का दिल धक से रह गया। उसने यह तो सिखाया ही नहीं था। उसने बस “हाय-हैलो” सिखाया था।
आरव चुप हो गया, पवन ने इशारे से उसे ‘गुड मॉर्निंग’ बोलने को कहा।
लेकिन आरव ने वो नहीं किया जो पवन ने सिखाया था। आरव अपनी कुर्सी से नीचे उतरा,

धीरे-धीरे चलकर प्रिंसिपल मिस्टर डिसूजा के पास गया और झुककर उनके पैर छुए। फिर हाथ जोड़कर बड़ी मासूमियत से बोला, “प्रणाम गुरुजी! “जयश्रीकृष्ण!”

कमरे में सन्नाटा छा गया। पवन को लगा कि अब तो रिजेक्शन पक्का है।
उसे अपनी माँ पर गुस्सा आने लगा- कि ज़रूर छिपकर उन्होंने ही यह सब सिखाया होगा।
रिया ने अपना माथा पकड़ लिया। लेकिन अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसकी पवन ने कल्पना भी नहीं की थी।
प्रिंसीपल जो अब तक गंभीर थे,जोर से हँस पड़े। उन्होंने आरव को उठाकर गोद में बैठा लिया।

“मिस्टर पवन, प्रिंसिपल ने कहा, “आज सुबह से मैंने पचास बच्चों का इंटरव्यू लिया।”
सब रोबोट की तरह ‘हाय’, ‘हैलो’ और ‘गुड मॉर्निंग’ बोल रहे थे। लेकिन आपके बेटे ने जो किया, वो हमारी संस्कृति है। यह संस्कार किताबों में नहीं मिलते।”

पवन हक्का-बक्का रह गया।
प्रिंसीपल ने आगे कहा: -“आजकल के पढ़े-लिखे मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेज बनाने की होड़ में अपनी जड़ें काट रहे हैं।
बच्चा अंग्रेजी तो स्कूल में सीख ही लेगा, लेकिन बड़ों के पैर छूना, “जयश्रीकृष्ण” कहना, अपनी भाषा पर गर्व करना… यह तो घर से ही मिलता है। कौन सिखाता है इसे यह सब?”

आरव चहकते हुए बोला, “मेरी दादी”वो कहती हैं कि विद्या तो विनय देती है, और सबसे बड़ी पढ़ाई झुकना होता है।”

प्रिंसिपल ने पवन की ओर देखा, “आपकी माँ को मेरा प्रणाम कहिएगा। उनका पोता आज सिर्फ इसलिए सेलेक्ट हुआ है क्योंकि उसके पास एक अलग पहचान है।
भाषा संवाद का जरिया है, शर्म का विषय नहीं।”

घर लौटते वक्त गाड़ी में सन्नाटा था। पवन को अपने कहे शब्द याद आ रहे थे- “गंवारी भाषा,” “नाक कट जाएगी।” आज उसी ‘गंवारी’ संस्कार ने उसे सबसे बड़े स्कूल में सम्मान दिलाया था।

घर पहुँचते ही पवन सीधा अपनी माँ के पास गया। गुणमाला देवी आंगन में तुलसी के पास बैठी थीं। पवन ने बिना कुछ बोले अपनी माँ के चरणों में सिर रख दिया।

“अरे-अरे, क्या हुआ लल्ला? इंटरव्यू खराब हो गया क्या?
मैंने कहा था न, मेरी परछाई मत पड़ने देना उस पर,” गुणमाला देवी ने घबराते हुए कहा।

“नहीं माँ”, पवन की आँखों में पश्चाताप के आंसू थे।
“इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। और वो सिर्फ तुम्हारी वजह से।

मुझे माफ़ कर दो माँ। मैं भूल गया था कि पेड़ चाहे कितना भी ऊँचा हो जाए, अगर जड़ों से कट गया तो सूख जाएगा।”

पवन ने आरव को पास बुलाया और कहा, “बेटा, दादी को बताओ तुमने स्कूल में क्या किया।”

जब आरव ने बताया, तो गुणमाला देवी ने उसे गले लगा लिया।

उस दिन पवन को समझ आ गया कि सूट-बूट और अंग्रेजी से आप ‘मॉडर्न’ बन सकते हैं,

लेकिन ‘इंसान’ आप अपने संस्कारों से ही बनते हैं। उसने महसूस किया कि सच ही कहा जाता है-
अनपढ़ लोगों की वजह से ही हमारी मातृभाषा और संस्कृति बची हुई है, वरना हम जैसे पढ़े-लिखे लोग तो अब “जयश्रीकृष्ण, और राम-राम” बोलने में भी शरमाते हैं और उसे पिछड़ापन मानते हैं।
उस शाम “पवन” ने भी घर में घुसते वक्त माँ से “हाय मॉम” नहीं, बल्कि हाथ जोड़कर “जयश्रीकृष्ण” कहा। गुणमाला देवी की झुर्रियों भरे चेहरे पर जो मुस्कान आई, वो किसी भी डिग्री से ज्यादा कीमती थी।

कहानी का सार :-

आधुनिक बनना गलत नहीं है, लेकिन अपनी जड़ों, अपनी भाषा और अपने बुजुर्गों को भूल जाना सबसे बड़ी नासमझी है।

अंग्रेजी एक भाषा है, हुनर है, लेकिन हमारी मातृभाषा और हमारे संस्कार हमारी पहचान हैं। अपनी संस्कृति पर शर्मिंदा न हों, बल्कि गर्व करें।

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