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आज की कहानी:समधी की चतुराई

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शहर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे। उनकी एक ही बेटी थी—संस्कारों में पली-बढ़ी, समझदार और पढ़ी-लिखी। बेटी की शादी की बात चल रही थी। उधर लड़के का परिवार भी अच्छा-खासा संपन्न था। दोनों परिवारों की मुलाकातें हुईं और रिश्ता पक्का हो गया।

शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। लड़की के पिता ने मन ही मन सोच लिया था कि वे अपनी हैसियत के अनुसार लगभग 25 लाख रुपये शादी में खर्च करेंगे। बड़े होटल में रिसेप्शन, सैकड़ों मेहमान, बैंड-बाजा, सजावट—सब कुछ भव्य होगा। वे अपनी इकलौती बेटी की शादी को यादगार बनाना चाहते थे।

एक दिन लड़के के पिता ने उन्हें अपने घर बुलाया। चाय-नाश्ते के बाद वे गंभीर स्वर में बोले,
“समधी जी, आप बेटी की शादी पर 25 लाख खर्च कर रहे हो। इधर मेरा भी लगभग इतना ही खर्चा हो जाएगा। मैं सोच रहा हूँ कि क्यों न इन पैसों का बेहतर उपयोग किया जाए? मेरा बेटा टाइल्स का व्यापार शुरू करना चाहता है। अगर हम 25 लाख उसमें लगा दें और शादी कोर्ट में सादगी से कर दें, तो बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।”

यह सुनकर लड़की के पिता कुछ देर चुप रहे। उनके मन में समाज का डर था। उन्होंने धीरे से कहा,
“लेकिन लोग क्या कहेंगे? रिश्तेदार, समाज… सब बातें बनाएंगे।”

लड़के के पिता मुस्कराए,
“समधी जी, लोग चार दिन बातें करेंगे, फिर चुप हो जाएंगे। लेकिन अगर बच्चों का भविष्य संवर गया, तो वही लोग तारीफ करेंगे। शादी एक दिन की होती है, पर जीवन पूरी उम्र का।”

लड़की के पिता रातभर सोचते रहे। उन्हें अपनी बेटी की खुशियाँ सबसे प्यारी थीं। आखिरकार उन्होंने अगले दिन कहा,
“ठीक है समधी जी, आपकी बात में दम है। लेकिन मैं भी एक शर्त रखता हूँ। मैं 10 लाख रुपये अपनी बेटी के नाम एफडी करवा दूँगा। यह उसकी सुरक्षा होगी। मुसीबत में दोनों के काम आएगी। बाकी हम सादगी से कोर्ट मैरिज कर देंगे।”

दोनों समधियों ने हाथ मिलाया। शादी सादगी से कोर्ट में हुई। न बैंड-बाजा, न दिखावा—सिर्फ कुछ करीबी लोग और आशीर्वाद। बचा हुआ पैसा लड़के के व्यापार में लगाया गया। कुछ ही महीनों में उसका टाइल्स का व्यवसाय चल निकला। बेटी के नाम की एफडी ने उसे आत्मविश्वास दिया कि जरूरत पड़ने पर उसके पास अपनी सुरक्षा है।

समय बीता। वही लोग, जो पहले बातें बना रहे थे, अब कहने लगे—“देखो, कितना समझदारी भरा फैसला था!”

एक दिन बेटी ने अपने पिता से कहा,
“पापा, आपने मेरे लिए जो सोचा, वह मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। आपने दिखावे की बजाय मेरे भविष्य को चुना।”

पिता की आँखें नम हो गईं। उन्हें एहसास हुआ कि सच्ची चतुराई वही है, जो रिश्तों को मजबूत करे और आने वाले कल को सुरक्षित बनाए।

शिक्षा:
शादी का असली अर्थ दिखावा नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन और बच्चों का सुरक्षित भविष्य है। समाज की सोच से ज्यादा जरूरी है समझदारी और दूरदृष्टि।

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