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Valmiki Ramayana: King Dasharatha, thinking man to be an elephant, fired the arrow piercing his words.

वाल्मीकि रामायण: मनुष्य को हाथी समझकर राजा दशरथ ने चला दिया शब्द भेदी बाण

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 राजा दशरथ को अपने द्वारा किए गए एक दुष्कर्म की याद आई जिसे वो अब अपनी पत्नी कौसल्या को बताते है। उन्होंने कहा, पिता के जीवनकाल में जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धर के रूप में मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं। इसी ख्याति में पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था।

एक बार वर्षा ऋतु के उस अत्यंत सुखद सुहावने समय में मैं धनुष-बाण लेकर रथ पर सवार हो शिकार खेलने के लिए सरयू नदी के तट पर गया। मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीने के घाट पर रात के समय जब कोई उपद्रवकारी भैंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा।

उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानी में घड़ा भरने की आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँ तक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथी के पानी पीते समय होने वाले शब्द के समान जान पड़ी। तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूंड में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाण का निशाना बनेगा। तरकस से एक तीर निकाला और उस शब्द को लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान बाण विषधर सर्प के समान भयंकर था। विषैले सर्प के सदृश उस तीखे बाण को मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानी में गिरते हुए किसी वनवासी का हाहाकार मुझे स्पष्ट रूप से सुनाई दिया। मेरे बाण से उसके मर्म में बड़ी पीड़ा हो रही थी।

वो बोला ! किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसको क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवों को पीड़ा देने की आवृत्ति का त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्य का अस्त्र से वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहनने वाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करने में किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारने वाले का क्या अपराध किया था? मेरी हत्या का प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया ! इससे किसी को कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा।

सरयू के किनारे उस स्थान पर जाकर मैंने देखा, एक तपस्वी बाण से घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़े का जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खून में सना हुआ है। वे बाण से बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रों से मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेज से मुझे भस्म कर देना चाहते हों। उन्होंने राजा से पूछा !

वन में रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिता के लिये पानी लेने की इच्छा से यहाँ आया था। तुमने एक ही बाण से मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अंधे और बूढ़े माता-पिता को भी मार डाला। वे दोनों बहुत दुबले और अंधे हैं। निश्चय ही प्यास से पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षा में बैठे होंगे। वे देर तक मेरे आगमन की आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे।

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