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वैदिक सुविचार

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आयुर्वेद में कहा है ―

ईर्ष्याभयक्रोधपरीक्षितेन, लुब्धेन रुग्दैन्यनिपीडितेन।
प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक् परिपाकमेति।।

उस मनुष्य का भोजन उत्तम रीति से नहीं पचता जिसके मन में ईर्ष्या, भय, क्रोध, लालच, रोग, दीनता और द्वेष के दुष्टभाव उपस्थित होते हैं। अतः शारीरिक स्वास्थय का सम्बन्ध मनुष्य के निर्मल मन से है।

प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति अक्सर बहुत कम बीमार होता है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति के शरीर में रोगों से लड़ने वाली रोघप्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है, जिसके कारण वह यदि रोगी भी है तो जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है। उसके लिए रोग का दुःख दुःख नहीं रहता।

It is said in the ‘Ayurveda’:-

The food of a person is not digested properly if the evil feelings of jealousy, fear, anger, greed and malice are present in his mind. Therefore, physical health is related to the pure mind of a person.

A person who is happy is rarely sick. The immune system of a happy person is quite effective due to which even if he is a patient, he gets well soon. For him the pain of illness is not sorrow.

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