सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग (EC) द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे किसी भी संशोधित Form-6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है। कोर्ट की यह टिप्पणी 2025 में Form-6 में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र (Annexure) को लेकर चल रहे विवाद के बीच आई है।
CJI सूर्यकांत ने रिकॉर्ड की जांच की बात कही
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि अदालत रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाना चाहती है कि Form-6 में बदलाव किसने किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संशोधित Form-6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है।
CJI ने कहा कि जब रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश किया जाएगा, तो यह देखा जाएगा कि फॉर्म में बदलाव किसके स्तर पर किए गए। यह टिप्पणी उस बयान के संदर्भ में आई, जिसमें चुनाव आयोग ने 28 सितंबर को कहा था कि Form-6 के साथ लगाए गए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था।
ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने के लिए कोई अंतरिम आदेश जारी करने से भी इनकार कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ फैसले एकतरफा लिए।
बेंच ने कहा कि जब तक चुनाव आयोग की ओर से जवाब नहीं मिल जाता, तब तक अदालत यह मानकर चलेगी कि आयोग के फैसले कानून के मुताबिक थे।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि सामने आई रिपोर्ट सही हो सकती है या गलत, लेकिन केवल रिपोर्ट के आधार पर अदालत कोई आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत को पहले चुनाव आयोग के जवाब का इंतजार करना होगा।
क्या है Form-6 से जुड़ा विवाद?
विवाद की मुख्य वजह ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में जोड़ा गया एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र है। इसके तहत SIR प्रक्रिया के दौरान नए मतदाताओं से खुद को या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी/नाना-नानी को पिछली मतदाता सूची से जोड़ने वाली जानकारी देने को कहा गया था।
मामला तब और चर्चा में आया जब इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस अतिरिक्त आवश्यकता पर आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, उनकी चिंता यह थी कि Form-6, Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित कानूनी फॉर्म है और नियमों में औपचारिक बदलाव किए बिना इसमें प्रभावी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
जून 2025 के SIR आदेश से शुरू हुआ मामला
इस विवाद की शुरुआत जून 2025 में चुनाव आयोग के SIR आदेश से हुई थी। इसमें पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए Form-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र, जिसे Annexure D कहा गया, जमा करने की आवश्यकता बताई गई थी।
हालांकि, जिस अतिरिक्त जानकारी की अब जांच हो रही है, उसे बाद में ऑनलाइन Form-6 प्रक्रिया में शामिल किया गया। जुलाई 2026 में शुरू हुई इस ऑनलाइन प्रक्रिया में आवेदकों से खुद को या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी/नाना-नानी को पिछली SIR मतदाता सूची से जोड़ने वाली जानकारी देने को कहा गया।
बिहार SIR फैसले के बाद बढ़ा विवाद
यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑनलाइन प्रक्रिया की यह अतिरिक्त आवश्यकता सुप्रीम कोर्ट के बिहार SIR मामले में 27 मई को दिए गए फैसले के कुछ सप्ताह बाद लागू की गई थी।
चुनाव आयोग का कहना है कि Form-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया था। आयोग के मुताबिक, SIR से जुड़ा घोषणा-पत्र एक अतिरिक्त आवश्यकता थी। सितंबर में जारी अपने बयान में आयोग ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने इस घोषणा-पत्र को सही ठहराया था और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म गैर-SIR अवधि में भी लागू रहेंगे।
27 मई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
27 मई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा था और इस प्रक्रिया के लिए तय दस्तावेजी ढांचे की समीक्षा की थी।
कोर्ट ने कहा था कि SIR के लिए Form-6 को अनिवार्य रूप से शब्दशः लागू करना जरूरी नहीं है और चुनाव आयोग के पास ऐसी प्रक्रिया के लिए उपयुक्त दस्तावेजी ढांचा तैयार करने की कुछ गुंजाइश है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह अधिकार असीमित नहीं है। कोर्ट के अनुसार, कानूनी ढांचे में किए जाने वाले किसी भी बदलाव का SIR के उद्देश्य से तार्किक संबंध होना चाहिए।







