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CEC ज्ञानेश कुमार को कैसे हटाया जा सकता है? जानें नियम

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admin
25 सितंबर 2026 | 10:52 am IST
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चुनाव आयोग (ECI) के भीतर कथित मतभेदों और स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग तेज कर दी है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में SIR, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और डेटा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग विचार संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सामूहिक प्रक्रिया से लिए जाते हैं।

इस घटनाक्रम के बाद संयुक्त विपक्ष ने संसद के दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों की मदद से प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है।

राहुल गांधी ने CEC पर लगाए गंभीर आरोप

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर आरोप लगाए हैं और उनके इस्तीफे की मांग की है।

राहुल गांधी ने कथित “वोट चोरी” को लेकर भाजपा, आरएसएस और चुनावी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। ये राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें किसी न्यायालय या अधिकृत जांच के स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। मौजूदा कानून के तहत नामों की सिफारिश एक चयन समिति करती है।

इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।

नियुक्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों पर विचार किया जाता है जो भारत सरकार में सचिव स्तर के पद के समकक्ष रह चुके हों और जिनके पास चुनाव प्रबंधन से संबंधित अनुभव तथा विशेषज्ञता हो।

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल अधिकतम छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है, इनमें से जो पहले हो।

CEC को पद से कैसे हटाया जा सकता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विशेष सुरक्षा दी गई है।

इसके मुताबिक CEC को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

इसका उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त को राजनीतिक या सरकारी दबाव से स्वतंत्र रखना है।

CEC को केवल सिद्ध दुराचार या अक्षमता जैसे आधारों पर हटाया जा सकता है।

वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की स्थिति अलग है। उन्हें हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है।

संसद में हटाने का प्रस्ताव कैसे आगे बढ़ता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद के जरिए आगे बढ़ती है। इसके लिए सांसद आरोपों का उल्लेख करते हुए प्रस्ताव का नोटिस देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को हटाने के लिए लागू संसदीय प्रक्रिया के अनुसार, लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद ऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं।

प्रस्ताव स्वीकार होने की स्थिति में आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की जा सकती है। जांच के बाद मामला सदन के सामने रखा जाता है।

कितने बहुमत की होती है जरूरत?

CEC को हटाना सामान्य बहुमत से संभव नहीं है।

संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्ताव को—

कुल सदस्य संख्या के बहुमत, और
उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत

से पारित होना आवश्यक होता है।

दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।

क्यों इतनी कठिन रखी गई है प्रक्रिया?

मुख्य चुनाव आयुक्त देश की चुनावी व्यवस्था का प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारी होता है। चुनाव आयोग पर लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी है।

इसी कारण संविधान निर्माताओं ने CEC को हटाने की प्रक्रिया कठिन रखी, ताकि किसी सरकार या राजनीतिक दल के दबाव में उसे आसानी से पद से न हटाया जा सके। अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों की निगरानी, दिशा और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी देता है।

मौजूदा विवाद में आगे क्या?

25 सितंबर 2026 तक विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसदीय प्रस्ताव लाने की बात कही है और मसौदा तैयार किए जाने की खबर है।

वहीं भाजपा और चुनाव आयोग की ओर से यह तर्क सामने आया है कि आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे अपने आप चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित नहीं होती। चुनाव आयोग ने भी कहा है कि उसके अंतिम निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए हैं।

ऐसे में आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि विपक्ष औपचारिक नोटिस कब देता है और संसद के संबंधित पीठासीन अधिकारी उस पर क्या निर्णय लेते हैं।