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एंटी-गुंडा बिल पर राष्ट्रपति की रोक, शुभेंदु सरकार को झटका

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admin
25 सितंबर 2026 | 02:22 pm IST
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पश्चिम बंगाल सरकार का West Bengal Public Safety and Control of Anti-Social Activities Bill, 2026 फिलहाल कानून नहीं बन सका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विधेयक को मंजूरी देने के बजाय पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार के पास वापस भेज दिया है।

केंद्र सरकार ने मुख्य रूप से उस प्रावधान पर आपत्ति जताई है जिसमें मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों को भी ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल किया गया है। केंद्र का कहना है कि यह प्रावधान पहले से मौजूद केंद्रीय कानूनों के साथ टकराव पैदा कर सकता है।

क्या है एंटी-गुंडा बिल?

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 29 जून 2026 को इस विधेयक को 176 के मुकाबले 41 मतों से पारित किया था। भाजपा सरकार ने इसे संगठित असामाजिक गतिविधियों, सार्वजनिक अव्यवस्था और हिंसा पर नियंत्रण के लिए जरूरी कदम बताया था।

विधेयक के तहत जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त या अधिकृत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ मानते हुए उसे किसी निर्धारित क्षेत्र या जिले से बाहर रहने का आदेश दे सकते हैं।

ऐसा आदेश अधिकतम एक वर्ष तक लागू रह सकता है। प्रस्तावित कानून में निवारक कार्रवाई और कुछ मामलों में हिरासत से जुड़े कड़े प्रावधान भी शामिल हैं।

NDPS कानून से टकराव पर केंद्र की आपत्ति

विवाद की मुख्य वजह मादक पदार्थों से जुड़े अपराध हैं।

केंद्र सरकार ने अपनी आपत्ति में कहा कि प्रस्तावित बिल का एक हिस्सा Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 और PITNDPS Act, 1988 के तहत पहले से मौजूद निवारक व्यवस्था के समानांतर तंत्र खड़ा कर सकता है।

इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच टकराव का सवाल उठाया गया है।

कानून-व्यवस्था बनाम नागरिक अधिकार

विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज रही है। शुभेंदु अधिकारी सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना है।

वहीं विपक्ष ने आशंका जताई है कि इतने व्यापक अधिकारों का दुरुपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जा सकता है। सरकार ने विधानसभा में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक बदले की भावना से नहीं किया जाएगा।

यही इस विधेयक का सबसे संवेदनशील पहलू भी है—एक ओर राज्य को अपराध और हिंसा से निपटने के लिए प्रभावी अधिकार चाहिए, तो दूसरी ओर ऐसे अधिकारों के इस्तेमाल पर कानूनी सुरक्षा और जवाबदेही भी जरूरी है।

हाईकोर्ट भी कर चुका है अहम टिप्पणी

6 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस विधेयक को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि मामला समय से पहले अदालत में लाया गया है, क्योंकि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना यह विधेयक अभी कानून नहीं बना था।

इससे यह भी स्पष्ट हो गया था कि विधेयक की संवैधानिक प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी।

अब आगे क्या होगा?

राष्ट्रपति द्वारा विधेयक लौटाए जाने के बाद राज्य सरकार के सामने अब प्रावधानों पर दोबारा विचार करने का रास्ता खुला है।

सरकार केंद्रीय कानून से टकराने वाले हिस्सों में संशोधन कर सकती है और प्रक्रिया, जवाबदेही तथा दुरुपयोग रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान जोड़ सकती है।

संशोधित विधेयक को दोबारा संवैधानिक मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है।

सख्ती के साथ संवैधानिक संतुलन जरूरी

पश्चिम बंगाल सरकार का तर्क है कि संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों से निपटने के लिए कठोर कानून जरूरी है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति की आपत्ति यह संकेत देती है कि ऐसा कानून केंद्रीय कानूनों से टकराव रहित और संवैधानिक ढांचे के भीतर होना चाहिए।

अब असली चुनौती यही है कि राज्य ऐसा कानून तैयार करे जो अपराध के खिलाफ प्रभावी भी हो और अदालत की संवैधानिक कसौटी पर भी खरा उतर सके।