अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के डीजल एक्सपोर्ट पर रोक लगाने के विचार का समर्थन करने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई हलचल शुरू हो गई है। अमेरिका और यूरोप में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने के बीच ट्रंप ने कहा कि अमेरिका बड़ी मात्रा में डीजल का उत्पादन करता है और घरेलू जरूरतों को देखते हुए इसके निर्यात को सीमित करने पर विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि अभी अमेरिका ने डीजल एक्सपोर्ट पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं किया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भी कहा है कि प्रशासन यह जांच रहा है कि पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध व्यावहारिक होगा या नहीं।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचीं डीजल की कीमतें
वैश्विक स्तर पर डीजल की सप्लाई पहले से ही दबाव में है। रूस, मध्य पूर्व और अन्य प्रमुख आपूर्ति क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव के कारण बाजार में उपलब्धता घटी है।
22 सितंबर को अमेरिका में डीजल का राष्ट्रीय औसत करीब 6.53 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गया था, जो रिकॉर्ड स्तर था। बढ़ी कीमतों का असर अमेरिकी किसानों, ट्रांसपोर्ट कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी पड़ रहा है।
घरेलू कीमतें घटाना चाहता है अमेरिका
डीजल एक्सपोर्ट सीमित करने के समर्थकों का तर्क है कि इससे अमेरिका के भीतर उपलब्ध सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतों पर कुछ समय के लिए दबाव कम हो सकता है।
लेकिन अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने चेतावनी दी है कि पूर्ण प्रतिबंध उल्टा असर भी डाल सकता है। उनके मुताबिक, निर्यात पूरी तरह रोकने पर अमेरिकी रिफाइनरियों को उत्पादन घटाना पड़ सकता है, जिससे पेट्रोल और जेट फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
यूरोप के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
अमेरिका यूरोप के लिए डीजल का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है। यदि अमेरिकी निर्यात में बड़ी कटौती होती है तो यूरोपीय खरीदारों को भारत, मध्य पूर्व और एशिया के अन्य सप्लायर्स से अधिक कार्गो खरीदने पड़ सकते हैं।
यूरोपीय आयोग ने भी संभावित अमेरिकी प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई है। हालांकि यूरोप अपने इस्तेमाल का लगभग 70 प्रतिशत डीजल घरेलू रिफाइनरियों से तैयार करता है, लेकिन अमेरिकी कार्गो में कमी से आयातित ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं।
भारत के लिए क्यों बन सकता है बड़ा अवसर?
वैश्विक डीजल संकट के बीच भारत की रिफाइनिंग क्षमता और निर्यात क्षमता महत्वपूर्ण हो गई है। भारत पहले से ही यूरोप समेत कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बड़ी मात्रा में डीजल भेजता है।
जुलाई 2026 में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने यूरोप को करीब 40 से 50 लाख बैरल डीजल निर्यात किया था, जो लगभग 10 महीनों का उच्च स्तर था। इसके अलावा कंपनी ने ब्राजील के लिए भी निर्यात बढ़ाया।
यदि अमेरिका अपने डीजल निर्यात में कटौती करता है तो यूरोपीय खरीदार भारत से अतिरिक्त सप्लाई की मांग बढ़ा सकते हैं।
भारत को मिलेगा बेहतर मार्जिन?
वैश्विक सप्लाई कम होने से डीजल की रिफाइनिंग मार्जिन पहले ही मजबूत बनी हुई है। ऐसे माहौल में भारतीय रिफाइनरियों को यूरोप और अन्य बाजारों में बेहतर कीमत मिल सकती है।
हालांकि यह तय नहीं है कि पूरा अतिरिक्त बाजार भारत के पास ही आएगा। चीन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और मध्य पूर्व के रिफाइनर भी अतिरिक्त मांग को पूरा करने की कोशिश करेंगे।
इसके अलावा शिपिंग लागत, प्रतिबंधों और कच्चे तेल की कीमतों का भी भारतीय निर्यात पर असर पड़ेगा।
ऑस्ट्रेलिया और एशिया में भी बढ़ सकती है प्रतिस्पर्धा
यूरोप यदि वैश्विक बाजार से अधिक मात्रा में डीजल खरीदता है तो एशिया-प्रशांत देशों को भी ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में भारत, मध्य पूर्व, दक्षिण कोरिया और चीन से निकलने वाले डीजल कार्गो के लिए यूरोप और एशिया के खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भारत बन सकता है अहम सप्लायर, लेकिन ‘किंग मेकर’ कहना जल्दबाजी
मौजूदा परिस्थितियों में भारत की भूमिका निश्चित रूप से मजबूत हो सकती है। बड़ी रिफाइनिंग क्षमता, यूरोप तक स्थापित सप्लाई नेटवर्क और बढ़ते डीजल निर्यात के कारण भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण सप्लायर बनकर उभर रहा है।
लेकिन अमेरिका की संभावित नीति अभी अंतिम नहीं है। इसलिए भारत को दुनिया का “सबसे बड़ा एनर्जी किंग मेकर” घोषित करना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
यदि अमेरिका वास्तव में डीजल निर्यात में बड़ी कटौती करता है और वैश्विक सप्लाई संकट जारी रहता है, तो भारत को यूरोप समेत कई बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर जरूर मिल सकता है।







