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चामुंडेश्वरी मंदिर: शिखर पर हैं 7 स्वर्ण कलश

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admin
23 अक्टूबर 2026 | 07:59 am IST
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मैसूरु की 3,489 फीट ऊंची चामुंडी पहाड़ी की चोटी पर स्थित श्री चामुंडेश्वरी मंदिर दक्षिण भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। यहां मां के दर्शन और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना लेकर दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। आध्यात्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर श्रद्धालुओं को एक विशेष अनुभव प्रदान करता है। आइए जानते हैं मां चामुंडेश्वरी की महिमा, मंदिर के इतिहास और इसकी अद्भुत विशेषताओं के बारे में।

मां चामुंडेश्वरी कौन हैं?

श्री चामुंडेश्वरी देवी को मां चामुंडी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वह मां दुर्गा के उग्र और शक्तिशाली स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी चामुंडी को देवी पार्वती का अवतार भी माना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, चामुंडी पहाड़ी पर आतंक मचाने वाले राक्षस महिषासुर का वध देवी चामुंडेश्वरी ने किया था। इसी कारण उन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के निकट महिषासुर की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है, जो इस पौराणिक कथा की याद दिलाती है।

3489 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मंदिर

कर्नाटक के मैसूरु शहर में चामुंडी पहाड़ियों पर समुद्र तल से लगभग 3,489 फीट की ऊंचाई पर श्री चामुंडेश्वरी मंदिर स्थित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र का प्राचीन ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है।

स्कंद पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में आठ पहाड़ियों से घिरे ‘त्रिमुता क्षेत्र’ का वर्णन मिलता है। चामुंडी पहाड़ी इसी पवित्र क्षेत्र का हिस्सा है। यहां स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर को क्षेत्र के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। पहाड़ी पर महाबलेश्वर मंदिर भी स्थित है, जो इस स्थान की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।

मैसूरु के राजपरिवार का रहा है विशेष योगदान

श्री चामुंडेश्वरी मंदिर के वर्तमान स्वरूप और इसकी भव्यता में मैसूरु के राजपरिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वोडेयार राजवंश के शासक देवी चामुंडेश्वरी के परम भक्त माने जाते थे।

मंदिर के इतिहास में महाराजा कृष्णराज वोडेयार तृतीय का विशेष स्थान है। उन्होंने वर्ष 1827 में मंदिर का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बना भव्य सात मंजिला गोपुरम इसकी वास्तुकला का प्रमुख आकर्षण है।

मैसूरु के राजपरिवार ने मंदिर को धार्मिक अनुष्ठानों और उत्सवों के लिए कई महत्वपूर्ण वस्तुएं भी भेंट की थीं। इनमें पारंपरिक रथों का विशेष महत्व है, जिनका उपयोग धार्मिक अवसरों पर निकाले जाने वाले जुलूसों में किया जाता रहा है।

द्रविड़ शैली की अद्भुत वास्तुकला

श्री चामुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारत की पारंपरिक द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर की संरचना, नक्काशी और ऊंचा गोपुरम इसकी भव्यता को दर्शाते हैं। प्रवेश द्वार पर बना सात मंजिला गोपुरम दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है।

मंदिर के शिखर पर स्थापित सात स्वर्ण कलश इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं। सूर्य की रोशनी में चमकते ये कलश मंदिर की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं।

मंदिर परिसर में नवरंग हॉल, प्राकार, अंतर्ला मंडप और मुख्य गर्भगृह जैसे प्रमुख हिस्से हैं। गर्भगृह के ऊपर बना छोटा और सुंदर विमान भी पारंपरिक दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला की विशेषता को प्रदर्शित करता है।

आस्था और इतिहास का अनूठा संगम

श्री चामुंडेश्वरी मंदिर धार्मिक आस्था, पौराणिक इतिहास और स्थापत्य कला का अनूठा संगम है। मां चामुंडेश्वरी के दर्शन के लिए वर्षभर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान मंदिर का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय हो जाता है।

मैसूरु आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह मंदिर प्रमुख आकर्षणों में से एक है। पहाड़ी की ऊंचाई से आसपास के क्षेत्र का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यही कारण है कि चामुंडेश्वरी मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष स्थान रखता है।