अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा और 1998 की याद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शंस बिल’ (Lindsey Graham Sanctions Bill) पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारत पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। इस विधेयक के तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिलती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा रूस से आयात होने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजार में भारतीय उत्पादों के सामने चुनौतियां बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब भारत को अमेरिका के आर्थिक और तकनीकी दबाव का सामना करना पड़ा हो। 1998 में पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन बाद में दोनों देशों के रिश्तों में बदलाव आया और प्रतिबंध हटा दिए गए।
पोखरण-II के बाद अमेरिका की नाराजगी
11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारतीय सेना की फायरिंग रेंज में ‘ऑपरेशन शक्ति’ के तहत तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए। इसके दो दिन बाद 13 मई को दो और परीक्षण किए गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित किया।
भारत के परमाणु परीक्षणों पर अमेरिका की तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। अमेरिकी विदेश विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, क्लिंटन ने इन परीक्षणों को लेकर चिंता जताई और कहा कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता तथा परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों पर असर पड़ सकता है।
भारत पर लगाए गए थे कड़े प्रतिबंध
13 मई 1998 को क्लिंटन ने ‘आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट’ की धारा 102, जिसे ग्लेन अमेंडमेंट के नाम से भी जाना जाता है, के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाए।
इन प्रतिबंधों के तहत अमेरिका की ओर से भारत को मिलने वाली अधिकांश विदेशी सहायता रोक दी गई। रक्षा उपकरणों, सैन्य सेवाओं और सैन्य वित्तपोषण से जुड़े सहयोग पर भी रोक लगी।
अमेरिका ने विश्व बैंक और IMF जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए भारत को मिलने वाली वित्तीय सहायता का भी विरोध किया। अमेरिकी बैंकों और सरकारी एजेंसियों को भारत को नए लोन और क्रेडिट देने पर भी प्रतिबंध लगाया गया, हालांकि खाद्य और कृषि उत्पादों की खरीद से जुड़े कुछ ऋण इसके दायरे से बाहर थे।
प्रतिबंधों का असर पड़ा, लेकिन भारत की नीति नहीं बदली
अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत पर कुछ आर्थिक और तकनीकी असर जरूर पड़ा। रक्षा उपकरणों की बिक्री और वित्तपोषण पर रोक का प्रभाव 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी महसूस किया गया। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से फंडिंग में रुकावट के कारण कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा परियोजनाओं में देरी हुई।
इसके बावजूद, भारत ने परमाणु परीक्षणों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए अपनी नीति में बदलाव नहीं किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 27 मई 1998 को संसद में परीक्षणों का बचाव किया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा भारत के फैसले का मुख्य आधार रही है।
उन्होंने परमाणु हथियारों को आत्मरक्षा का माध्यम बताते हुए कहा था कि इनका उद्देश्य भारत को परमाणु धमकी या दबाव से बचाना है।
व्यापारिक साझेदारों में विविधता आई
प्रतिबंधों के दौर में भारत ने अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों को बनाए रखा और अलग-अलग देशों के साथ व्यापार जारी रखा। अमेरिका के साथ भी व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ।
यूरोपीय देशों, रूस, जापान, चीन और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते सक्रिय रहे। रूस से रक्षा उपकरणों के साथ-साथ ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग जारी रहा, जबकि भारत ने अलग-अलग बाजारों में अपने निर्यात को बनाए रखा।
तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने 2001 में PTI से बातचीत में कहा था कि कुछ रक्षा आपूर्ति को छोड़कर अमेरिकी प्रतिबंधों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीमित असर पड़ा।
भारत-अमेरिका के बीच बातचीत नहीं रुकी
प्रतिबंधों के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक बातचीत जारी रही। दोनों देशों ने मतभेदों के बावजूद संबंध सुधारने की कोशिशें जारी रखीं।
2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत की यात्रा पर आए। यह 1978 के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा थी। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
2001 में अमेरिका ने हटाए प्रतिबंध
22 सितंबर 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भारत पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटा दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग का रास्ता और खुला।
9/11 हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक प्रयासों में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ा। आगे चलकर 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को नई दिशा दी।
आज के रिश्तों में आया बड़ा बदलाव
1998 के मुकाबले आज भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंध काफी गहरे हैं। अमेरिका भारतीय निर्यात के प्रमुख बाजारों में शामिल है और दोनों देशों के बीच व्यापार का आकार भी काफी बढ़ चुका है।
ऐसे में भविष्य में किसी बड़े अमेरिकी टैरिफ या प्रतिबंध का असर 1998 की तुलना में अलग हो सकता है, क्योंकि आज दोनों अर्थव्यवस्थाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
1998 से क्या समझ आता है?
1998 के घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि भारत और अमेरिका के बीच गंभीर मतभेदों के बावजूद संवाद पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। भारत ने अपनी रणनीतिक नीति को जारी रखा और साथ ही अमेरिका के साथ बातचीत भी बनाए रखी।
बाद के वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में धीरे-धीरे सुधार आया और आर्थिक तथा रणनीतिक सहयोग बढ़ता गया। मौजूदा दौर में भी भारत-अमेरिका संबंधों पर किसी भी संभावित व्यापारिक या रणनीतिक तनाव का असर दोनों देशों के व्यापक आर्थिक हितों के संदर्भ में देखा जाना होगा।







