देश में Special Intensive Revision (SIR) और चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच आयोग की ओर से बड़ा स्पष्टीकरण सामने आया है। चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने उन मीडिया रिपोर्टों को खारिज किया है, जिनमें SIR को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच गंभीर मतभेद होने का दावा किया गया था।
आयोग के सूत्रों के मुताबिक, SIR सहित सभी रणनीतिक और प्रशासनिक फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं। आयोग ने कहा कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
क्या था विवाद?
यह स्पष्टीकरण द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कई फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, Form 6 में बदलाव तथा चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट में दोनों आयुक्तों की ओर से कुछ फैसलों को उनकी जानकारी या आवश्यक मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए जाने का दावा किया गया है।
Form 6 में बदलाव पर भी उठे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में SIR से जुड़े कुछ सवाल जोड़े गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की थी।
रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने मई में कहा था कि Form 6 और Form 8 जैसे वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी है। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।
मतदाता डेटा तक पहुंच का मुद्दा
रिपोर्ट में चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन को लेकर भी सवालों का जिक्र है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटा तक पहुंच और उसके प्रबंधन में कथित केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस मुद्दे को लेकर दोनों आयुक्तों ने चुनावी IT सिस्टम और अधिकारियों की भूमिका से जुड़े सवाल उठाए थे।
SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
SIR के तहत मतदाता सूचियों की समीक्षा और सत्यापन किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया को लेकर बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और उसके बाद अपीलों का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में 38 लाख से अधिक अपीलें दाखिल हुई हैं। इनमें 22.21 लाख अपीलें हटाए गए मतदाताओं को दोबारा शामिल करने से संबंधित थीं, जबकि 16.10 लाख अपीलें मतदाता सूची में शामिल किए गए नामों को हटाने की मांग से जुड़ी थीं।
विपक्ष ने उठाए सवाल
मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों और नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी नेताओं ने रिपोर्ट में सामने आए दावों के आधार पर CEC ज्ञानेश कुमार की भूमिका और आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मामले को गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की। वहीं, विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी आपत्तियां सार्वजनिक कीं।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
वहीं, चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने मीडिया रिपोर्टों में बताए गए अंदरूनी मतभेद के दावे को खारिज करते हुए कहा कि सभी महत्वपूर्ण फैसलों पर CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति रही है।
इस तरह SIR को लेकर विवाद के दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं—एक ओर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का दावा है, जबकि दूसरी ओर चुनाव आयोग इन रिपोर्टों को खारिज करते हुए अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।







