संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही 13 अगस्त 2026 को अनिश्चित काल के लिए स्थगित (Adjourned Sine Die) कर दी गई थी। हालांकि, इसके करीब 40 दिन बाद भी मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान (Prorogation) नहीं हुआ है। मौजूदा स्थिति को असामान्य माना जा रहा है, क्योंकि आमतौर पर कार्यवाही स्थगित होने के कुछ दिनों के भीतर राष्ट्रपति की ओर से सत्रावसान की अधिसूचना जारी हो जाती है।
2015 का रिकॉर्ड भी पीछे छूटा
रिपोर्टों के मुताबिक, 2026 के मानसून सत्र में कार्यवाही स्थगित होने और सत्रावसान के बीच का अंतर 2015 के 28 दिनों के अंतर से भी आगे निकल चुका है। 2015 में भी सत्रावसान में देरी हुई थी, लेकिन इस बार यह अंतर और लंबा हो गया है।
संसदीय कार्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, सत्रावसान की प्रक्रिया में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद सरकार का निर्णय संसद के दोनों सचिवालयों को भेजा जाता है और इसके बाद राष्ट्रपति के आदेश को अधिसूचित किया जाता है।
सत्रावसान और स्थगन में क्या अंतर है?
‘Adjournment Sine Die’ का मतलब है कि सदन की कार्यवाही को बिना अगली बैठक की तारीख तय किए अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। वहीं Prorogation यानी सत्रावसान राष्ट्रपति के आदेश से पूरे संसदीय सत्र को औपचारिक रूप से समाप्त करने की प्रक्रिया है।
सत्रावसान के बाद भी सदन में लंबित विधेयक सामान्य तौर पर समाप्त नहीं होते। इसके विपरीत, लोकसभा के विघटन (Dissolution) का अलग संवैधानिक प्रभाव होता है।
देरी के बीच महिला आरक्षण और परिसीमन की चर्चा
सत्रावसान में देरी के बीच महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक बदलावों को लेकर भी चर्चा हुई है। अगस्त में रिपोर्टों में सामने आया था कि सरकार महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने से जुड़े बदलावों पर राजनीतिक दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही थी।
प्रस्तावित बदलावों को परिसीमन के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों, खासकर दक्षिणी राज्यों की पार्टियों ने आबादी के आधार पर परिसीमन से लोकसभा में उनके प्रतिनिधित्व पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई है।
विपक्ष ने उठाए सवाल
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सत्रावसान में देरी पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि सरकार परिसीमन से जुड़े विधेयकों के लिए जरूरी समर्थन जुटाने के उद्देश्य से सत्र को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं कर रही है। यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है; सरकार की ओर से इस देरी को लेकर अलग कारण सार्वजनिक रूप से सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
इससे पहले संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अगस्त में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर तत्काल विशेष सत्र बुलाए जाने की खबरों को खारिज किया था।
आगे क्या होगा?
संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत संसद के सत्रों को बुलाने और सत्रावसान की संवैधानिक प्रक्रिया में राष्ट्रपति की भूमिका है। संसदीय कार्य मंत्रालय के अनुसार, सत्रावसान सरकार की प्रक्रिया और मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति के आदेश से होता है।
फिलहाल मुख्य सवाल यही है कि मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान कब होता है और क्या इसके बाद शीतकालीन सत्र या किसी विशेष बैठक को लेकर कोई निर्णय सामने आता है। 13 अगस्त को मानसून सत्र स्थगित होने के बाद से यही असामान्य अंतराल राजनीतिक और संसदीय चर्चा का विषय बना हुआ है।







