National Thoughts Logo
National Thoughts
AWebPortalOfPositiveJournalism

चेयरमैन का कास्टिंग वोट vs ट्रस्ट्स का वीटो, फिर क्यों चर्चा में 2021 का SC फैसला?

a
admin
22 सितंबर 2026 | 01:29 pm IST
Featured Image

टाटा संस के बोर्डरूम में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर नया विवाद सामने आया है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने 17 सितंबर को हुए उस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है, जिसके तहत चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने का प्रस्ताव रखा गया था।

नोएल टाटा का तर्क है कि इस बार पुनर्नियुक्ति के लिए उस संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिसे 2022 में अपनाया गया था। दूसरी ओर, टाटा संस ने कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (Articles of Association) की अलग व्याख्या पर भरोसा किया है।

विवाद के केंद्र में आर्टिकल 104B, 118 और 121

पूरे मामले के केंद्र में टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के आर्टिकल 104B, 118 और 121 हैं। ट्रस्ट्स का कहना है कि कुछ मामलों में ट्रस्ट-नॉमिनी डायरेक्टरों के बहुमत की सकारात्मक सहमति जरूरी है।

ट्रस्ट्स की दलील के अनुसार, यदि यह जरूरी सहमति हासिल नहीं होती तो बोर्ड चेयरमैन के ‘कास्टिंग वोट’ यानी निर्णायक मत के जरिए उस कमी को दूर नहीं कर सकता।

वहीं, टाटा संस की ओर से आर्टिकल्स की ऐसी व्याख्या सामने आई है जिसमें बराबर वोट होने की स्थिति में चेयरमैन के कास्टिंग वोट के प्रावधान को महत्व दिया गया है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों को मिली कानूनी राय में भी अलग-अलग व्याख्याएं सामने आई हैं।

आर्टिकल 118 को लेकर क्यों है मतभेद?

आर्टिकल 118 चेयरमैन की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान है। 2021 में सुप्रीम कोर्ट के सामने आए टाटा संस से जुड़े मामले में इस प्रावधान की व्याख्या की गई थी। उस समय कोर्ट के सामने मौजूद प्रावधान में चेयरमैन पद के लिए उम्मीदवार की सिफारिश करने वाली सिलेक्शन कमिटी और उसके बाद बोर्ड द्वारा नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख था।

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा चेयरमैन को हटाने के संदर्भ में ‘उसी प्रक्रिया’ के अर्थ को आर्टिकल 121 के तहत वोटिंग प्रक्रिया से जोड़ा था। कोर्ट ने यह नहीं कहा था कि मौजूदा चेयरमैन को हटाने के लिए हर बार नई सिलेक्शन कमिटी बनाना जरूरी होगा।

हालांकि, मौजूदा विवाद में परिस्थितियां अलग हैं। 2021 का मामला साइरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाने से संबंधित था, जबकि वर्तमान विवाद चंद्रशेखरन के कार्यकाल के नवीनीकरण से जुड़ा है। 2021 के फैसले में यह विशेष रूप से तय नहीं किया गया था कि मौजूदा चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति पर आर्टिकल 118 किस तरह लागू होगा।

2022 की प्रक्रिया भी बनी अहम कड़ी

नोएल टाटा की ओर से यह तर्क दिया गया है कि 2022 की बोर्ड मीटिंग के मिनट्स में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को आर्टिकल 118 के तहत किया गया बताया गया था। इसी आधार पर ट्रस्ट्स का पक्ष है कि इस बार भी संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

इसके विपरीत, टाटा संस की कानूनी व्याख्या के अनुसार आर्टिकल 118 मुख्य रूप से नए चेयरमैन की नियुक्ति से संबंधित है और मौजूदा चेयरमैन के कार्यकाल के नवीनीकरण पर इसे उसी तरह लागू करना जरूरी नहीं है।

इसलिए इस विवाद का एक प्रमुख सवाल यह है कि मौजूदा आर्टिकल्स और 2022 तथा 2026 के बोर्ड प्रस्तावों की सही कानूनी व्याख्या क्या है।

आर्टिकल 121 और ट्रस्ट-नॉमिनी डायरेक्टरों की भूमिका

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा आर्टिकल 121 और ट्रस्ट्स द्वारा नामित डायरेक्टरों से जुड़ा है। 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आर्टिकल 104B और 121 के तहत मौजूद विशेष वोटिंग व्यवस्था की विस्तार से जांच हुई थी।

आर्टिकल 104B के तहत, निर्धारित परिस्थितियों में दो टाटा ट्रस्ट्स को मिलकर काम करने पर बोर्ड में एक-तिहाई डायरेक्टरों को नामित करने का अधिकार दिया गया था। वहीं, आर्टिकल 121 में कुछ ऐसे मामलों के लिए विशेष वोटिंग व्यवस्था थी, जिनमें बोर्ड के बहुमत की आवश्यकता होती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस विशेष व्यवस्था को चुनौती देने वाली दलीलों को स्वीकार नहीं किया था। फैसले में ट्रस्ट-नॉमिनी डायरेक्टरों की विशेष स्थिति और उनके वोटिंग अधिकारों के दायरे पर भी चर्चा की गई थी।

2021 का साइरस मिस्त्री फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह पूरा विवाद 2021 के Tata Consultancy Services Ltd. बनाम Cyrus Investments Pvt. Ltd. मामले के फैसले की ओर ध्यान खींच रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े विशेष अधिकारों की वैधता तथा उनके दायरे पर विचार किया था।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया था कि टाटा संस एक मुख्य इन्वेस्टमेंट होल्डिंग कंपनी थी और उसकी लगभग 66 प्रतिशत इक्विटी परोपकारी ट्रस्ट्स के पास थी। इसी संदर्भ में कोर्ट ने ट्रस्ट-नॉमिनी डायरेक्टरों की स्थिति को आम बैठक के जरिए नियुक्त किए गए अन्य डायरेक्टरों से अलग माना था।

हालांकि, 2021 का फैसला अपने तत्कालीन विवाद और उस समय के संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। इसे मौजूदा चंद्रशेखरन पुनर्नियुक्ति विवाद पर सीधे फैसला मानना अलग कानूनी सवाल होगा।

सिंघवी और साल्वे की दलीलों में अंतर

इस मामले में वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और हरीश साल्वे की सार्वजनिक रूप से सामने आई कानूनी व्याख्याएं भी चर्चा में हैं। सिंघवी, जो ट्रस्ट्स और नोएल टाटा की ओर से सलाह दे रहे हैं, ने 2021 के फैसले में ट्रस्ट्स की विशेष स्थिति को महत्वपूर्ण बताया है।

दूसरी ओर, साल्वे की ओर से आर्टिकल्स और कास्टिंग वोट से जुड़े प्रावधानों की अलग कानूनी व्याख्या सामने आई है।

इस तरह मौजूदा विवाद केवल चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल का सवाल नहीं है, बल्कि टाटा संस के बोर्ड में चेयरमैन के निर्णायक मत, ट्रस्ट-नॉमिनी डायरेक्टरों की सहमति और कंपनी के संवैधानिक दस्तावेजों की व्याख्या से जुड़े व्यापक कॉर्पोरेट गवर्नेंस सवालों से भी जुड़ा है।