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निजी क्षेत्र की रफ्तार 4 साल के निचले स्तर पर, सेवा क्षेत्र में सुस्ती

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admin
24 जुलाई 2026 को 07:19 am बजे
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भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों की रफ्तार जुलाई 2026 में चार वर्षों से अधिक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) जून के 57.1 से घटकर जुलाई में 54.3 पर आ गया। यह आंकड़ा बाजार के 57.7 के अनुमान से भी काफी कम रहा।

हालांकि PMI अभी भी 50 अंक से ऊपर है, जो आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का संकेत देता है, लेकिन वृद्धि की रफ्तार में स्पष्ट सुस्ती देखने को मिल रही है।

सेवा क्षेत्र की कमजोरी बनी सबसे बड़ी वजह

निजी क्षेत्र की धीमी रफ्तार का सबसे बड़ा कारण सेवा क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन रहा।

सेवा व्यवसाय गतिविधि सूचकांक जून के 57.4 से गिरकर 53.1 पर पहुंच गया, जो फरवरी 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर है।

कंपनियों का कहना है कि चुनौतीपूर्ण कारोबारी माहौल, ग्राहकों की मांग में कमी और कुछ ऑर्डर रद्द होने के कारण सेवा क्षेत्र की गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।

विनिर्माण क्षेत्र ने दिखाई मजबूती

सेवा क्षेत्र की तुलना में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, हालांकि यहां भी हल्की सुस्ती दर्ज की गई।

फैक्ट्री गतिविधि सूचकांक 54.2 से घटकर 53.9 पर आ गया, जो चार महीने का निचला स्तर है। इसके बावजूद उत्पादन और नए ऑर्डरों में वृद्धि जारी रही।

विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी बाजारों से मजबूत मांग मिलने के कारण निर्यात ऑर्डर मार्च के बाद सबसे तेज गति से बढ़े, जिससे विनिर्माण क्षेत्र को सहारा मिला।

रोजगार में लगातार सातवें महीने बढ़ीं नियुक्तियां

सुस्ती के बावजूद रोजगार के मोर्चे पर सकारात्मक संकेत मिले हैं।

कंपनियों ने लगातार सातवें महीने नई भर्तियां कीं, जिससे रोजगार सृजन की प्रक्रिया जारी रही और श्रम बाजार को कुछ राहत मिली।

बढ़ती लागत से कंपनियों पर दबाव

ईंधन, श्रम, कच्चे माल और परिवहन लागत में लगातार बढ़ोतरी ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है।

इस अतिरिक्त बोझ का कुछ हिस्सा कंपनियों ने ग्राहकों पर डाला, जिसके चलते बिक्री मूल्य आधारित महंगाई तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई।

आर्थिक वृद्धि के लिए बढ़ी चिंता

ताजा PMI आंकड़े बताते हैं कि भारतीय निजी क्षेत्र अभी भी विस्तार कर रहा है, लेकिन उसकी रफ्तार पहले की तुलना में काफी धीमी हो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेवा क्षेत्र की सुस्ती और लागत का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और कारोबारी गतिविधियों पर पड़ सकता है।