अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर भारतीय मुद्रा पर भी देखने को मिला। शुक्रवार, 24 जुलाई 2026 को शुरुआती कारोबार में रुपया कमजोर होकर लगभग 96.80 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो मई में दर्ज 96.96 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के बेहद करीब था। हालांकि, बाद में रुपये ने कुछ सुधार किया और यह करीब 96.50 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया।
RBI के संभावित हस्तक्षेप से रुपये को मिली राहत
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर की बिक्री कर रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने की कोशिश की।
हालांकि RBI की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन सरकारी बैंकों द्वारा बाजार में डॉलर की बढ़ी हुई आपूर्ति को केंद्रीय बैंक के संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी बड़ी वजह
मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर देश के आयात बिल, व्यापार घाटे और महंगाई पर पड़ सकता है।
डॉलर की बढ़ती मांग से बढ़ा दबाव
तेल कंपनियों और अन्य आयातकों को भुगतान के लिए अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
इसके अलावा, घरेलू शेयर बाजार की कमजोरी और कंपनियों द्वारा डॉलर की हेजिंग बढ़ाने से भी रुपये की स्थिति प्रभावित हुई है।
महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन खर्च, उत्पादन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
अब इन कारकों पर रहेगी बाजार की नजर
आने वाले दिनों में रुपये की चाल मुख्य रूप से तीन अहम कारकों पर निर्भर करेगी—
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें
मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक और विदेशी मुद्रा बाजार संबंधी रणनीति
इन सभी पहलुओं पर निवेशकों, कारोबारियों और उद्योग जगत की नजर बनी रहेगी।







