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RBI Monetary Policy: 4 साल बाद बढ़ा Repo Rate, अब 5.5% हुई दर

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admin
7 अक्टूबर 2026 | 11:16 am IST
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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बुधवार को अपनी तीन दिवसीय बैठक के बाद बड़ा फैसला लिया है। RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स यानी 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही रेपो रेट बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है।

इस फैसले का असर आम जनता की जेब पर पड़ सकता है। रेपो रेट बढ़ने से होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI महंगी होने की संभावना है। 5 से 7 अक्टूबर तक चली MPC की बैठक में दरें बढ़ाने का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया।

RBI ने बदला पॉलिसी का रुख

रेपो रेट बढ़ाने के साथ RBI ने अपनी पॉलिसी का रुख बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (Calibrated Tightening) कर दिया है। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महंगाई पर काबू पाने के लिए मौद्रिक नीति में सख्ती बनाए रखने के संकेत दे रहा है।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि यह फैसला महंगाई की बदलती स्थिति को देखते हुए लिया गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, लेकिन महंगाई से जुड़े हालात पिछले साल की तुलना में अब उतने सामान्य नहीं हैं।

महंगाई को लेकर RBI की चिंता

गवर्नर के मुताबिक, अगले तीन तिमाहियों में हेडलाइन CPI महंगाई औसतन 5.8 फीसदी रहने का अनुमान है। वहीं, पूरे वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 4.4 फीसदी रखा गया है।

MPC का फैसला मुख्य रूप से महंगाई के बदलते हालात पर केंद्रित रहा। RBI के मुताबिक, महंगाई की उम्मीदों में बढ़ोतरी और कीमतों पर दबाव बढ़ने के कुछ संकेत मिले हैं। हालांकि, सप्लाई-साइड के दबाव का कंपनियों के कीमत तय करने के फैसलों पर व्यापक असर पड़ने के सीमित संकेत मिले हैं।

रेपो रेट बढ़ाने की क्या रही वजह?

RBI का यह फैसला वैश्विक स्तर पर खाद्य और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों, वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव और सख्त होते ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के बीच आया है।

गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक आर्थिक विकास मजबूत बना हुआ है, लेकिन इस साल इसके धीमे पड़ने की उम्मीद है। वहीं, ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें वैश्विक महंगाई पर दबाव बढ़ा रही हैं।

इसके अलावा, ट्रेड से जुड़ी अनिश्चितता, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और अमेरिकी डॉलर की मजबूती को भी वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए चुनौतीपूर्ण कारकों के तौर पर बताया गया है।

जियोपॉलिटिकल तनाव भी बड़ी चुनौती

MPC ने माना कि जियोपॉलिटिकल घटनाक्रमों के कारण वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। हालांकि, इन बाहरी दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत बनी हुई है और आर्थिक गतिविधियों में व्यापक गति देखने को मिल रही है।

RBI ने यह भी कहा कि सप्लाई शॉक के ‘सेकंड-राउंड’ असर, यानी महंगाई की उम्मीदों और कंपनियों के कीमत तय करने के फैसलों पर पड़ने वाले प्रभाव को नियंत्रित करने में मौद्रिक नीति को कुछ समय लग सकता है।

फिलहाल रेट कट की उम्मीद कम

RBI की ओर से पॉलिसी रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ किए जाने को महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इससे फिलहाल ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम होती दिख रही है।

गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि RBI के अगले फैसले महंगाई और आर्थिक विकास की स्थिति पर निर्भर होंगे। उन्होंने कहा कि निकट भविष्य में रेट कट की संभावना नहीं है। आगे ब्याज दरों को बढ़ाने या मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का फैसला बदलते आर्थिक हालात और भविष्य के अनुमानों के आधार पर लिया जाएगा।