National Thoughts Logo
National Thoughts
AWebPortalOfPositiveJournalism

घर तक पहुंचा नल, लेकिन पानी की जिम्मेदारी किसकी?

a
admin
05 अगस्त 2026 को 05:36 am बजे
Featured Image

सिमरन कुमारी, मुजफ्फरपुर, बिहारकल्पना कीजिए उस परिवार की, जहां घर में कमाने वाला केवल एक व्यक्ति है और पांच लोगों का पेट उसी की दैनिक मजदूरी से चलता है। महीने की आमदनी पहले ही इतनी सीमित है कि राशन, बच्चों की पढ़ाई, दवाई और दूसरे जरूरी खर्चों के बाद कुछ बचता नहीं। ऐसे परिवार के घर का नल अगर खराब हो जाए या पाइपलाइन में टूट-फूट हो जाए और पानी आना बंद हो जाए तो उसके सामने सबसे पहला सवाल यही होगा कि मरम्मत के पैसे कहां से आएंगे? कई बार ऐसी स्थिति में परिवार की महिलाएं फिर से पुराने स्रोतों की ओर लौटने को मजबूर हो जाती है। वह पानी के बर्तन उठाती है, हैंडपंप तक जाती है, कतार में खड़ी होती है और घर की जरूरत के मुताबिक पानी लाती है। यानी जिस सुविधा ने उसके श्रम को कम किया था, उसके खराब पड़ते ही वही श्रम फिर उसके हिस्से में लौट आता है।

दरअसल, बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में घरों तक नल का पहुंचना सिर्फ पानी आने का एक साधन नहीं है, बल्कि उसने महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन में एक बड़ा बदलाव लाया है। जिन परिवारों की महिलाओं और किशोरियों को कभी पानी भरने के लिए दूर जाना पड़ता था, उनके लिए घर में नल लगना सुविधा के साथ समय और श्रम की बचत भी है। मुजफ्फरपुर के ग्रामीण इलाकों में भी हर घर नल जल योजना के पहुंचने से अनेक परिवारों को इसका लाभ मिला है। खासकर महिलाओं के लिए इसका अर्थ है कि पानी लाने में लगने वाला समय अब दूसरे कामों, पढ़ाई या आजीविका से जुड़े कामों में लगाया जा सकता है। लेकिन किसी सरकारी योजना की असली सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने घरों तक पाइप और नल पहुंच गए, बल्कि इससे होती है कि वे नल कितने समय तक लगातार काम करते हैं।

बिहार में जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के 18 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार बिहार में कुल 1.6755 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 1.6036 करोड़ परिवारों तक नल से जलापूर्ति दर्ज की गई है, यानी लगभग 95.71 प्रतिशत ग्रामीण परिवार नल जल आपूर्ति से जुड़े हैं। वर्ष 2019 में यह आंकड़ा केवल 1.89 प्रतिशत था। यह उपलब्धि बताती है कि घरों तक पानी पहुंचाने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने में राज्य ने बड़ी दूरी तय की है।

मुजफ्फरपुर और गया में अप्रैल 2025 में किए गए एक अध्ययन में भी ग्रामीण परिवारों में 94 प्रतिशत से अधिक के पास नल का कनेक्शन पाया गया था। अध्ययन के अनुसार 93.80 प्रतिशत परिवारों को कम से कम 70 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी मिल रहा था और 95.12 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उन्हें महीने में 25 से 30 दिन पानी मिल रहा है। आंकड़े निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करते हैं, लेकिन इनके पीछे एक दूसरी तस्वीर भी है, जिस पर उतनी ही गंभीरता से बात करने की जरूरत है और वह है इसके रखरखाव में आने वाले खर्च की.

सवाल यह है कि किसी योजना की जिम्मेदारी सरकार और पंचायत के लिए कहां तक है और नागरिकों के लिए कहां से शुरू होती है? नल लगाकर पानी पहुंचा देना पहला कदम है, लेकिन पाइपलाइन, पंप, मोटर, टंकी और वितरण व्यवस्था को चालू हालत में रखना उतना ही जरूरी है। जल जीवन मिशन में पेयजल योजनाओं की योजना, क्रियान्वयन, संचालन और रखरखाव की मूल जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। केंद्र सरकार राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता देती है। साथ ही केंद्र ने राज्यों को ऐसी व्यवस्था बनाने की सलाह दी है जिसमें योजनाओं को ग्राम पंचायतों या ग्राम स्तर की जल एवं स्वच्छता समितियों को सौंपकर उनके माध्यम से संचालन और रखरखाव किया जाए। बिहार में ग्रामीण पेयजल योजना का क्रियान्वयन पंचायती राज विभाग से भी जुड़ा है और वार्ड स्तर पर सात सदस्यीय वार्ड क्रियान्वयन एवं प्रबंधन समिति की व्यवस्था बताई गई है।

इसका मतलब यह नहीं है कि पाइप टूटने पर गरीब परिवार को अपनी जेब से हर बार मरम्मत करानी चाहिए। अगर योजना की सार्वजनिक पाइपलाइन या उससे जुड़ी सरकारी जलापूर्ति व्यवस्था में खराबी आई है, तो उसके लिए जिम्मेदार स्थानीय तंत्र को शिकायत दर्ज कराकर मरम्मत की व्यवस्था करनी चाहिए। समस्या यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर लोगों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि खराब नल की शिकायत कहां करें, किस अधिकारी या समिति से संपर्क करें और शिकायत के बाद कितने समय में समस्या का समाधान होना चाहिए। नतीजा यह होता है कि शिकायत पंचायत से लेकर दूसरे कार्यालयों के बीच घूमती रहती है, जबकि घर में पानी की कमी का सामना परिवार, और विशेषकर महिलाएं, करती रहती हैं।

इसके अलावा जल जीवन मिशन को दिसंबर 2028 तक बढ़ाया गया है और नए चरण में ग्रामीण पाइप जलापूर्ति योजनाओं के ऑपरेशन और मेंटेनेंस तथा उनकी दीर्घकालिक स्थिरता पर विशेष जोर दिया गया है। मिशन का कुल वित्तीय परिव्यय बढ़ाकर 8.69 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जिसमें केंद्र का हिस्सा 3.59 लाख करोड़ रुपये है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना होगा। सरकार से किसी योजना के लिए फंड का उपलब्ध होना और उस फंड से खराब नल को ठीक कर देना, दोनों एक ही बात नहीं हैं। गरीब परिवार के लिए यह फर्क बहुत बड़ा है। उसके पास न तो मरम्मत के लिए अलग बजट है और न ही इतना समय कि वह बार-बार पंचायत कार्यालय के चक्कर लगाता रहे।

जल जीवन मिशन की सफलता का मूल्यांकन केवल ‘कितने घरों में नल पहुंचा’ से नहीं होना चाहिए। अगला सवाल होना चाहिए कि कितने नल नियमित रूप से काम कर रहे हैं, खराब होने पर कितने समय में ठीक होते हैं और शिकायत करने वाले परिवार को इसके लिए कितना खर्च या श्रम करना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि हर पंचायत में जलापूर्ति संबंधी शिकायत के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक व्यवस्था बनाई जाए। प्रत्येक गांव और वार्ड में यह जानकारी प्रदर्शित हो कि नल या पाइपलाइन खराब होने पर किसे शिकायत करनी है, शिकायत का नंबर क्या है और कितने समय में मरम्मत की जानी है।

शिकायतों का रजिस्टर सार्वजनिक हो और लंबित शिकायतों की ग्राम सभा में समीक्षा की जाए। गरीब और मजदूरी पर निर्भर परिवारों से सार्वजनिक जलापूर्ति व्यवस्था की खराबी ठीक कराने के नाम पर अनिवार्य निजी खर्च न लिया जाए। महिलाओं को केवल पानी की उपभोक्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन समितियों में निर्णय लेने वाली सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। विकास की असली कसौटी यही है कि सरकार द्वारा बनाई गई सुविधा सबसे कमजोर परिवार के लिए भी लगातार उपलब्ध रहे।

(यह लेखिका की निजी राय है)