कॉर्पोरेट जगत में इन दिनों Essel Group के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत दिवाला मामले को लेकर चर्चा तेज है। करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले महज 6.5 करोड़ रुपये की भुगतान योजना को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष ने इसे भारी ‘हेयरकट’ बताते हुए केंद्र सरकार और बैंकिंग व्यवस्था पर निशाना साधा है।
हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच डॉ. सुभाष चंद्रा ने खुद सामने आकर अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर कोई कर्ज नहीं लिया था, बल्कि कई कंपनियों के ऋण में व्यक्तिगत गारंटर की भूमिका निभाई थी। ऐसे में सवाल यह है कि क्या गारंटर की देनदारी को सीधे व्यक्तिगत कर्ज के तौर पर देखा जा सकता है?
सुभाष चंद्रा ने Instagram Live में क्या कहा?
डॉ. सुभाष चंद्रा ने Instagram पर लाइव आकर अपने व्यक्तिगत दिवाला मामले से जुड़े आंकड़ों और घटनाक्रम पर सफाई दी। उनका दावा है कि उन्होंने अपने नाम पर एक भी रुपये का कर्ज नहीं लिया।
उनके मुताबिक, वह करीब 18 से 20 कंपनियों के व्यक्तिगत गारंटर बने थे। ये कंपनियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से Essel Group से जुड़ी हुई थीं। उनका कहना है कि कंपनियों ने कारोबार के विस्तार, रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों के लिए कर्ज लिया था, न कि उनके निजी इस्तेमाल के लिए।
उधारकर्ता और गारंटर में क्या है अंतर?
सुभाष चंद्रा ने अपने बचाव में उधारकर्ता और गारंटर के बीच के अंतर को अहम बताया है। उनके अनुसार, उधारकर्ता वह होता है जो ऋण लेता है, जबकि गारंटर ऋणदाता को यह आश्वासन देता है कि उधारकर्ता के भुगतान में चूक होने पर वह निर्धारित कानूनी दायरे में जिम्मेदारी निभाएगा।
चंद्रा का कहना है कि उनके मामले को केवल ‘22 हजार करोड़ रुपये का कर्ज’ बताना पूरे मामले की तस्वीर पेश नहीं करता, क्योंकि उनके अनुसार वह इन ऋणों के मूल उधारकर्ता नहीं थे।
गारंटर बनना बताया ‘सबसे बड़ी गलती’
डॉ. चंद्रा ने गारंटी देने के अपने फैसले को सही ठहराने के बजाय इसे अपनी ‘सबसे बड़ी गलती’ बताया। उनका कहना है कि शायद यही निर्णय उन्हें मौजूदा स्थिति तक लेकर आया।
उन्होंने बताया कि जिन लोगों और कंपनियों के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, उनमें कुछ परिचित लोग थे, कुछ परिवार से जुड़े थे और कुछ करीबी संबंधों वाले लोग थे।
NCLT ने 6.5 करोड़ रुपये की योजना को दी मंजूरी
इस मामले में NCLT ने 25 अगस्त को Insolvency and Bankruptcy Code के तहत डॉ. चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी।
योजना के मुताबिक, 6.25 करोड़ रुपये लेनदारों को और 25 लाख रुपये दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए प्रस्तावित किए गए हैं। इस तरह कुल राशि करीब 6.5 करोड़ रुपये बैठती है।
वहीं, स्वीकृत दावों की कुल राशि 22,006.57 करोड़ रुपये बताई गई है। इसी बड़े अंतर को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ है।
विपक्ष ने ‘99.97% हेयरकट’ पर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मामले को लेकर NCLT पर सवाल उठाते हुए सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इतनी कम राशि वाली भुगतान योजना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे सामान्य ‘हेयरकट’ से आगे का मामला बताया।
विपक्ष का सवाल है कि जब आम लोगों और किसानों पर छोटे कर्ज की अदायगी न होने पर सख्त कार्रवाई हो सकती है, तो हजारों करोड़ रुपये के दावों वाले मामले में इतनी कम राशि की भुगतान योजना को मंजूरी कैसे मिली?
चंद्रा का दावा- व्यक्तिगत दावा 22 हजार करोड़ नहीं
डॉ. सुभाष चंद्रा ने विपक्ष के आरोपों से अलग आंकड़े पेश किए हैं। उनका कहना है कि व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में उनके खिलाफ वास्तविक दावा 22 हजार करोड़ रुपये नहीं, बल्कि करीब 3,992 करोड़ रुपये है।
उनके अनुसार, इस राशि के मामले में भी वह मूल उधारकर्ता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत गारंटर हैं।
चंद्रा का दावा है कि करीब 620 करोड़ रुपये के दावों का पहले ही निस्तारण हो चुका है। वहीं, उधार लेने वाली इकाइयों की ओर से 1,063 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान करने की पेशकश की गई है।
कंपनियों के भुगतान को लेकर भी किया दावा
डॉ. चंद्रा के मुताबिक, जिन कंपनियों के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, वे अब तक करीब 43 हजार करोड़ रुपये चुका चुकी हैं। उनका दावा है कि यदि कोई राशि अभी भी बकाया है तो उसके निपटान का आश्वासन दिया गया है।
यही वजह है कि चंद्रा का पक्ष यह है कि पूरे मामले को केवल 22,006 करोड़ रुपये के दावे और 6.5 करोड़ रुपये की भुगतान योजना के आधार पर देखना सही तस्वीर नहीं दिखाता।
आखिर 22 हजार करोड़ और 3,992 करोड़ का अंतर क्यों?
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि 22,006.57 करोड़ रुपये का आंकड़ा किस तरह के दावों को दर्शाता है और व्यक्तिगत दिवाला मामले में वास्तविक देनदारी कितनी मानी गई है।
एक तरफ स्वीकृत दावों का आंकड़ा 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि चंद्रा व्यक्तिगत कार्यवाही में अपने खिलाफ करीब 3,992 करोड़ रुपये के दावे की बात कर रहे हैं।
यही अंतर अब राजनीतिक बहस का बड़ा आधार बन गया है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि गारंटर की कानूनी जिम्मेदारी और मूल उधारकर्ता की देनदारी को किस तरह अलग-अलग देखा जाए।
कई बैंकों ने NCLT के फैसले को दी चुनौती
मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। LIC Housing Finance, HDFC Bank और Union Bank of India समेत कई लेनदारों ने NCLT की मंजूरी को चुनौती दी है।
NCLAT ने इस चुनौती पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमति दी है। HDFC Bank समेत कुछ अन्य बैंकों ने भी पुनर्भुगतान योजना का विरोध किया है। ऐसे में अंतिम कानूनी तस्वीर आगे होने वाली सुनवाई और फैसलों के बाद ही स्पष्ट होगी।
‘बैंकों ने कोई लोन माफ नहीं किया’- चंद्रा
डॉ. चंद्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके मुताबिक बैंकों ने कोई कर्ज माफ नहीं किया है। उनका कहना है कि जो भी वैध बकाया है, उसका निपटान कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाएगा।
उन्होंने अपनी निजी संपत्ति को लेकर भी कहा कि चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में उन्होंने पहले करीब 39 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी, जो अब लगभग 31 करोड़ रुपये रह गई है।
दिवाला प्रक्रिया के बीच नया कारोबार शुरू करने की तैयारी
व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के बावजूद डॉ. चंद्रा ने भविष्य में नया स्टार्टअप शुरू करने की योजना भी जाहिर की है। उनका कहना है कि वह कानून के दायरे में रहते हुए कुछ दोस्तों और साझेदारों के साथ नया उद्यम शुरू करेंगे।
क्या है पूरे विवाद का असली मुद्दा?
फिलहाल सुभाष चंद्रा का मामला सिर्फ एक कारोबारी की व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। यह कॉरपोरेट कर्ज, व्यक्तिगत गारंटी, बैंकिंग व्यवस्था, दिवाला कानून और राजनीतिक आरोपों के बीच बड़ी बहस बन चुका है।
एक ओर 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले 6.5 करोड़ रुपये की भुगतान योजना पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर सुभाष चंद्रा का कहना है कि 22 हजार करोड़ रुपये को उनकी व्यक्तिगत देनदारी के रूप में पेश करना सही नहीं है और वह मूल उधारकर्ता नहीं, बल्कि कंपनियों के व्यक्तिगत गारंटर थे।
अब इस मामले में NCLAT की सुनवाई और आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अंतिम तस्वीर इससे और स्पष्ट होगी कि कुल दावे कितने हैं, वास्तविक व्यक्तिगत देनदारी कितनी है और गारंटर के तौर पर सुभाष चंद्रा की कानूनी जिम्मेदारी किस सीमा तक बनती है।
जरूरी बात
इस मामले से जुड़े आंकड़ों और दावों को लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग व्याख्या सामने आई है। इसलिए 22 हजार करोड़ रुपये के दावे और 6.5 करोड़ रुपये की भुगतान योजना को सीधे ‘22 हजार करोड़ का कर्ज लेकर 6.5 करोड़ लौटाना’ कहना पूरे कानूनी और वित्तीय मामले का पूर्ण विवरण नहीं माना जा सकता।






