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कजरी तीज व्रत पारण की सही विधि और नियम जानें

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admin
01 सितंबर 2026 को 04:59 am बजे
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कजरी तीज: कजरी तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। कई स्थानों पर कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।

कजरी तीज पर पूजा-पाठ और व्रत के साथ व्रत पारण यानी व्रत खोलने की विधि का भी विशेष महत्व माना जाता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि व्रत किस समय और किस विधि से खोलना चाहिए और क्या चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पारण किया जाता है। आइए जानते हैं कजरी तीज व्रत के पारण की संपूर्ण विधि, नियम और धार्मिक महत्व।

कब मनाई जाती है कजरी तीज?

साल 2026 में कजरी तीज का पर्व 31 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 30 अगस्त को सुबह 9 बजकर 36 मिनट से शुरू होकर 31 अगस्त को सुबह 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। सूर्योदय के समय तृतीया तिथि होने के कारण कजरी तीज 31 अगस्त को मनाई जाएगी।

व्रत पारण से पहले करें विधि-विधान से पूजा

कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद माता नीमड़ी और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा करने की परंपरा है।

पूजा के दौरान रोली, अक्षत, फूल, मेहंदी, फल, मिठाई और सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है। कई क्षेत्रों में सत्तू का भोग लगाने की भी परंपरा है। दिनभर व्रत रखने के बाद पूजा और व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है।

शाम के समय चंद्रमा के दर्शन और पूजन की तैयारी की जाती है।

चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा

कजरी तीज के व्रत में कई क्षेत्रों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की विशेष परंपरा है। शाम की पूजा के बाद चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल अर्पित किया जाता है। कुछ स्थानों पर जल में दूध, अक्षत और रोली मिलाकर अर्घ्य देने की परंपरा भी है।

अर्घ्य देने के बाद चंद्रमा की पूजा और प्रार्थना की जाती है। इस दौरान व्रती महिलाएं पति की लंबी आयु, वैवाहिक सुख और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कई परंपराओं में चंद्र पूजन पूरा होने के बाद ही व्रत खोलने की मान्यता है।

कजरी तीज व्रत का पारण कैसे करें?

कजरी तीज का व्रत खोलने से पहले शाम की पूजा पूरी करें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर उनकी पूजा करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करें। व्रत पूर्ण होने की प्रार्थना करने के बाद अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करें।

व्रत खोलते समय सबसे पहले पानी या दूध ग्रहण किया जा सकता है। इसके बाद फल या हल्का सात्विक भोजन लिया जा सकता है। यदि पूरे दिन निर्जला व्रत रखा गया है, तो अचानक अधिक मात्रा में भोजन करने के बजाय धीरे-धीरे भोजन करना उचित माना जाता है।

पारण के समय इन बातों का रखें ध्यान

कजरी तीज के पारण में सात्विक भोजन करने की परंपरा है। व्रत खोलते समय बहुत अधिक तला-भुना, मसालेदार या भारी भोजन करने से बचना चाहिए।

पारण के लिए फल, दूध, दही, सत्तू या अन्य हल्का भोजन लिया जा सकता है। कई क्षेत्रों में कजरी तीज पर सत्तू का विशेष महत्व माना जाता है। इसी वजह से इसे कुछ स्थानों पर सातूड़ी तीज भी कहा जाता है।

पूजा के बाद सत्तू का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है।

निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं रखें विशेष सावधानी

कजरी तीज पर कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ स्थानों पर फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत रखने की परंपरा है। इसलिए व्रत और पारण के नियम क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। वहीं स्वास्थ्य संबंधी कारणों से निर्जला व्रत रखना संभव न होने पर अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत रखने की परंपरा भी प्रचलित है।

कजरी तीज का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार कजरी तीज भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित पर्व है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस व्रत में शामिल होती हैं।

कजरी तीज को कई जगह कजली तीज, बड़ी तीज और सातूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत कई राज्यों में यह पर्व अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है।

जरूरी बात

कजरी तीज के व्रत, चंद्रमा को अर्घ्य और पारण की विधि में क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत खोलते समय अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग में दिए गए नियमों का भी ध्यान रखना चाहिए।