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हल षष्ठी 2026: व्रत कथा का पाठ करें, घर में बनी रहेगी सुख-शांति

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admin
29 अगस्त 2026 को 06:38 am बजे
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Hal Shashthi 2026: धार्मिक मान्यता के अनुसार हल षष्ठी की पूजा के साथ व्रत कथा का श्रवण और पाठ करना भी विशेष फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक हल षष्ठी व्रत कथा सुनने या पढ़ने से व्रत का पुण्य प्राप्त होता है। यह पर्व विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और परिवार की मंगल-कामना से जुड़ा माना जाता है।

2 सितंबर को मनाई जाएगी हल षष्ठी

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हल षष्ठी, हरछठ और हलछठ के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम और षष्ठी माता की पूजा करने की परंपरा है। खासतौर पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं।

वर्ष 2026 में हल षष्ठी का पर्व 2 सितंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि 2 सितंबर की सुबह शुरू होकर 3 सितंबर की सुबह तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर को रखा जाएगा।

हल षष्ठी पर व्रत कथा का महत्व

धार्मिक परंपरा में हल षष्ठी के दिन पूजा-पाठ के साथ व्रत कथा सुनना भी महत्वपूर्ण माना गया है। इस पर्व से जुड़ी कई लोक और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें एक कथा ग्वालिन और षष्ठी माता की कृपा से संबंधित है।

कथा में बताया गया है कि किस प्रकार ग्वालिन से व्रत के दौरान एक भूल हो गई और बाद में अपनी गलती का एहसास होने पर उसने षष्ठी माता से क्षमा मांगी। माता की कृपा से उसके बच्चे को जीवनदान मिला।

हल षष्ठी से जुड़ी ग्वालिन की कथा

प्राचीन समय की बात है। एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह दूध और दही बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती थी। कुछ समय बाद वह गर्भवती हो गई और धीरे-धीरे उसके प्रसव का समय भी नजदीक आने लगा।

इसी दौरान गांव में हल षष्ठी का पर्व आया। गांव की महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से व्रत रख रही थीं। वे व्रत के नियमों का पालन करते हुए पूजा-पाठ और कथा श्रवण की तैयारी कर रही थीं।

ग्वालिन को भी हल षष्ठी के व्रत के बारे में जानकारी थी, लेकिन उसके सामने एक समस्या थी। उसके घर में बेचने के लिए दूध और दही रखा हुआ था। साथ ही, वह गर्भवती थी और प्रसव का समय भी करीब था। उसे चिंता होने लगी कि अगर अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई तो वह दूध-दही बेचने का काम कैसे पूरा करेगी।

व्रत के दिन ग्वालिन से हुई भूल

ग्वालिन ने किसी तरह अपना काम पूरा करने का निर्णय लिया। उसने गांव की कुछ महिलाओं से कहा कि वह भी हल षष्ठी का व्रत रख रही है। लेकिन इसके बाद उसने घर में रखा गाय का दूध बेच दिया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार हल षष्ठी के दिन गाय का दूध बेचने की मनाही मानी जाती है। दूध बेचने के बाद अचानक ग्वालिन को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह घबरा गई और किसी तरह गांव के बाहर झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंची।

वहीं उसने एक बच्चे को जन्म दिया। प्रसव के बाद उसकी हालत ऐसी थी कि वह नवजात बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं कर सकी। बच्चा झरबेरी की झाड़ी के पास ही पड़ा रह गया।

ग्वालिन को डर था कि यदि व्रत रखने वाली महिलाओं को उसके द्वारा की गई गलती के बारे में पता चला तो उसे बहुत बुरा लगेगा। इसी डर के कारण वह वहां से चली गई और अपने काम में लग गई।

व्रत रखने वाली महिलाओं को हुआ संदेह

कुछ समय बाद हल षष्ठी का व्रत रखने वाली महिलाएं उसी रास्ते से गुजर रही थीं। उन्होंने झरबेरी की झाड़ी के पास एक नवजात बच्चे को देखा। बच्चे को इस अवस्था में देखकर महिलाएं तुरंत उसके पास पहुंचीं।

आसपास देखने और पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि बच्चे को ग्वालिन ने वहां छोड़ा था। महिलाओं ने ग्वालिन को बुलाकर उससे इस बारे में पूछा।

ग्वालिन ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसने यह भी बताया कि हल षष्ठी के दिन उसने गाय का दूध बेच दिया था। अपनी भूल का एहसास होने पर उसने महिलाओं से क्षमा मांगी।

षष्ठी माता से ग्वालिन ने मांगी क्षमा

अपनी गलती समझने के बाद ग्वालिन ने षष्ठी माता से सच्चे मन से क्षमा प्रार्थना की। उसने व्रत रखने वाली महिलाओं से भी अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी।

महिलाओं ने उसे व्रत की मर्यादा का पालन करने और श्रद्धापूर्वक षष्ठी माता की पूजा करने की सलाह दी। इसके बाद ग्वालिन वापस उसी झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंची, जहां उसने अपने नवजात बच्चे को छोड़ा था।

माता की कृपा से जीवित मिला बच्चा

झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंचकर ग्वालिन ने जो देखा, उसे देखकर वह हैरान रह गई। उसका बच्चा जीवित और सुरक्षित था। यह देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए।

ग्वालिन ने षष्ठी माता को प्रणाम किया और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। उसने माता की कृपा के लिए आभार व्यक्त किया और भविष्य में हल षष्ठी व्रत की मर्यादा का पूरी तरह पालन करने का संकल्प लिया।

धार्मिक परंपरा में इस कथा को हल षष्ठी से जुड़ी प्रचलित कथाओं में शामिल किया जाता है। मान्यता है कि हल षष्ठी के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने तथा व्रत कथा का श्रवण करने से संतान और परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।