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Eid ul Azha 2026: कुर्बानी और सब्र का पर्व बकरीद, जानें हजरत इब्राहिम की कहानी

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admin
28 मई 2026 को 05:32 am बजे
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आज 28 मई 2026 को देशभर में ईद-उल-अजहा का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। भारत में इसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है। इस्लाम धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में शामिल यह पर्व कुर्बानी, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

ईद-उल-अजहा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह भाईचारे, इंसानियत और जरूरतमंदों की मदद का भी संदेश देता है। इसी कारण इसे “कुर्बानी की ईद” कहा जाता है।

ईद-उल-अजहा का इतिहास और महत्व

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, ईद-उल-अजहा का संबंध हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल के कठिन इम्तिहान से जुड़ा है।

मान्यता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को ख्वाब में अपनी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने का आदेश दिया। हजरत इब्राहिम के लिए उनके बेटे हजरत इस्माइल सबसे प्रिय थे। अल्लाह के हुक्म का पालन करने के लिए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया।

जब हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी रखी, तब अल्लाह ने उनकी नीयत, ईमान और समर्पण को स्वीकार कर लिया। उसी समय फरिश्ते जिब्रईल के जरिए हजरत इस्माइल की जगह एक भेड़ भेज दी गई।

इसी घटना की याद में दुनिया भर के मुसलमान हर साल अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी देते हैं। इसे “सुन्नत-ए-इब्राहिम” भी कहा जाता है।

कैसे मनाई जाती है बकरीद?

ईद-उल-अजहा के दिन सुबह मुसलमान नए कपड़े पहनकर ईदगाह या मस्जिद में नमाज अदा करने पहुंचते हैं। वहां दो रकात ईद की नमाज पढ़ी जाती है और देश-दुनिया में अमन, शांति और खुशहाली की दुआ की जाती है।

नमाज के बाद ऊंट, बकरा, भेड़ या अन्य हलाल जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त को जरूरतमंदों के साथ बांटने की परंपरा है, ताकि समाज में भाईचारा और समानता बनी रहे।

कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से

इस्लामिक परंपरा के अनुसार, कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है—

पहला हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है।

दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों में बांटा जाता है।

तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है।

क्या संदेश देता है यह पर्व?

ईद-उल-अजहा का असली संदेश त्याग, समर्पण और इंसानियत है। यह पर्व सिखाता है कि इंसान को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की मदद करनी चाहिए और जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटनी चाहिए।

इस खास मौके पर घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और लोग एक-दूसरे को गले लगाकर “ईद मुबारक” कहते हैं।