दिल्ली, बिहार, असम समेत कई राज्यों में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने पर चर्चा चल रही है। इसी बीच दिल्ली पुलिस की जांच रिपोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 20 जुलाई को हुए संसद मार्च के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन पर पहले से हत्या, डकैती, दुष्कर्म, अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों से जुड़े गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
यदि रिपोर्ट के निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो यह बहस और तेज हो सकती है कि हिंसक घटनाओं में शामिल सभी लोगों को एक ही श्रेणी में रखना कितना उचित होगा।
Delhi Police की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार द्वारा सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा में 2,873 लोगों की पहचान की गई। इनमें से 989 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड गंभीर मामलों से जुड़ा होने का दावा किया गया है।
पुलिस के अनुसार इन लोगों की पहचान फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS), सीसीटीवी फुटेज, पुलिस कैमरों और आम नागरिकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो के आधार पर की गई।
किन मामलों में दर्ज थे आरोप?
रिपोर्ट के अनुसार पहचाने गए लोगों में—
101 पर हत्या के मामले दर्ज रहे हैं।
62 पर हत्या के प्रयास के आरोप हैं।
284 लोग डकैती और लूट से जुड़े मामलों में आरोपी रहे हैं।
92 लोगों पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों के मामले दर्ज बताए गए हैं।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि—
61 आरोपी दुष्कर्म के मामलों से जुड़े रहे हैं।
25 पर छेड़छाड़ के आरोप हैं।
6 लोगों पर पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत मामले दर्ज हैं।
229 आरोपी आर्म्स एक्ट के मामलों से जुड़े हैं।
135 पर स्नैचिंग के मामले दर्ज हैं।
19 लोगों पर अपहरण के आरोप हैं।
67 आरोपी एनडीपीएस (NDPS) कानून से जुड़े मामलों में नामजद रहे हैं।
कई लोगों पर दर्ज हैं अनेक आपराधिक मामले
रिपोर्ट के अनुसार कई ऐसे लोग भी पहचान में आए जिनके खिलाफ एक नहीं बल्कि अनेक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
दिल्ली पुलिस का दावा है कि हत्या के 101 आरोपियों में से 42 के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं, जबकि 12 लोगों पर 10 या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे चल चुके हैं। इसी तरह डकैती और लूट के 284 आरोपियों में से 155 के खिलाफ कई मामले दर्ज बताए गए हैं और 31 लोगों पर 10 से अधिक मुकदमे लंबित हैं।
रिपोर्ट के आधार पर पुलिस का कहना है कि भीड़ में कथित रूप से आदतन अपराधियों की भी उल्लेखनीय मौजूदगी थी।
पुलिस ने बल प्रयोग क्यों किया?
दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के लिए केवल जंतर-मंतर पर अनुमति दी गई थी, जबकि संसद मार्च की अनुमति नहीं थी।
रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ते हुए संसद क्षेत्र की ओर बढ़े। पुलिस का दावा है कि कई बार चेतावनी देने के बावजूद भीड़ नहीं रुकी, जिसके बाद हालात को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस दौरान वरिष्ठ अधिकारियों सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
जांच रिपोर्ट के बाद उठे नए सवाल
पुलिस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। यदि बड़ी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग वास्तव में प्रदर्शन में शामिल थे, तो यह जांच का विषय है कि उनकी भूमिका क्या थी और क्या उन्होंने हिंसा को बढ़ावा देने में कोई भूमिका निभाई।
हालांकि, इन प्रश्नों के अंतिम उत्तर विस्तृत जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
लोकतांत्रिक अधिकार और कानून व्यवस्था दोनों जरूरी
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सार्वजनिक संपत्ति तथा लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी आंदोलन में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा में शामिल लोग दोनों मौजूद हों, तो जांच के आधार पर दोनों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। निर्दोष लोगों को राहत मिलनी चाहिए, जबकि हिंसा, तोड़फोड़ या अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
पूर्व DGP एसपी वैद की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपी वैद ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार और सीजेपी (CJP) के बीच हुए समझौते में हिंसा के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों का उल्लेख नहीं किया गया।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि भविष्य में फिर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो कानून-व्यवस्था संभालने वाले पुलिसकर्मियों के मनोबल और सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।
20 जुलाई की हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट ने कई गंभीर दावे किए हैं। हालांकि इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और विस्तृत जांच के बाद ही होगी। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और निर्दोष लोगों को अलग करना लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा कानून के शासन—दोनों के लिए आवश्यक है। इससे एक ओर शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा होगी, वहीं हिंसा और आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित की जा सकेगी।






