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Dark Web पर लीक हुआ DRDO का संवेदनशील डेटा, बढ़ी सुरक्षा चिंता

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admin
28 जुलाई 2026 को 06:13 am बजे
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देश में जब भी प्रश्नपत्र लीक की घटना सामने आती है तो राजनीतिक बहस तेज हो जाती है, लेकिन इससे कहीं अधिक गंभीर खतरा लगातार देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहा है। यह खतरा है संवेदनशील सरकारी और रक्षा संबंधी डाटा के लीक होने का। यह केवल कुछ डिजिटल फाइलों की चोरी नहीं, बल्कि भारत की सामरिक शक्ति, वैज्ञानिक उपलब्धियों और रक्षा तैयारियों पर संभावित हमला माना जा सकता है।

हाल के वर्षों में कभी कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के लीक होने की खबरें सामने आईं, तो अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के कथित संवेदनशील डाटा के डार्क वेब पर बिक्री के लिए उपलब्ध होने का दावा किया गया है। ऐसे समय में जब भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, इस तरह की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं।

डार्क वेब पर DRDO का कथित संवेदनशील डाटा

ताजा मामला रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) से जुड़े कथित डाटा लीक का है। तिरुवनंतपुरम स्थित एक साइबर फॉरेंसिक एवं रक्षा समाधान कंपनी ने दावा किया है कि करीब 31 गीगाबाइट संवेदनशील डाटा डार्क वेब पर 8,000 डॉलर में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह डाटा पिछले लगभग दो सप्ताह से बिक्री के लिए सूचीबद्ध है। सार्वजनिक रूप से साझा किए गए कुछ नमूना दस्तावेजों में वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुमोदन, हस्ताक्षर और प्रतिबंधित तकनीकी जानकारियां होने का दावा किया गया है।

मिसाइल तकनीक से जुड़ी जानकारी होने का दावा

रिपोर्ट में कहा गया है कि उपलब्ध नमूना फाइलों में अत्याधुनिक मार्गदर्शन सेंसर (Guidance Sensor) की आंतरिक इलेक्ट्रॉनिक संरचना से जुड़ी जानकारियां भी शामिल हैं। माना जा रहा है कि इसी प्रकार की तकनीक का उपयोग आधुनिक मिसाइलों और स्मार्ट हथियार प्रणालियों में किया जाता है।

यदि इन दावों की पुष्टि होती है, तो यह केवल डाटा चोरी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि देश की सामरिक क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बेहद गंभीर विषय बन सकता है।

DRDO ने अभी नहीं की आधिकारिक पुष्टि

हालांकि, DRDO ने फिलहाल इस कथित डाटा लीक की पुष्टि नहीं की है। संगठन के सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट की सत्यता की जांच की जा रही है।

जिस साइबर सुरक्षा कंपनी ने इस डाटा की पहचान का दावा किया है, उसका कहना है कि वह नियमित रूप से डार्क वेब, साइबर अपराध मंचों और रैनसमवेयर गिरोहों की गतिविधियों पर निगरानी रखती है। कंपनी के तकनीकी निदेशक के अनुसार संदिग्ध दस्तावेज मिलने के तुरंत बाद इसकी जानकारी खुफिया ब्यूरो (IB) को दे दी गई थी। अब संबंधित सरकारी एजेंसियां दस्तावेजों की प्रामाणिकता और संभावित सुरक्षा जोखिम का मूल्यांकन कर रही हैं।

विशेषज्ञ बोले- जांच पूरी होने तक निष्कर्ष न निकालें

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। उनका मानना है कि उपलब्ध दस्तावेजों की तकनीकी और डिजिटल फॉरेंसिक जांच बेहद जरूरी है।

विशेषज्ञ यह भी जानना चाहते हैं कि कथित डाटा वास्तव में DRDO से ही लिया गया है या किसी अन्य रक्षा इकाई से संबंधित है। इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि डाटा कब और किस माध्यम से बाहर निकाला गया।

क्या यह पुराना साइबर हमला हो सकता है?

रिपोर्ट में सामने आए कुछ नमूना दस्तावेज वर्ष 2020 के बताए जा रहे हैं। इससे आशंका जताई जा रही है कि यह किसी पुराने साइबर हमले का हिस्सा हो सकता है, जिसे अब चरणबद्ध तरीके से सार्वजनिक कर दबाव बनाने या धन उगाही के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा हो।

जांच एजेंसियां इसी पहलू की भी पड़ताल कर रही हैं।

पहले भी DRDO पर साइबर हमले का दावा

यह पहली बार नहीं है जब DRDO का नाम किसी साइबर हमले से जुड़ा हो। पिछले वर्ष भी एक हैकर समूह ने संगठन के सिस्टम में सेंध लगाने का दावा किया था।

हालांकि उस समय सुरक्षा एजेंसियों की जांच में DRDO की सुरक्षित प्रणालियों में किसी वास्तविक घुसपैठ की पुष्टि नहीं हुई थी। जांच में सामने आया था कि कुछ दस्तावेज इंटरनेट से जुड़े एक प्रशासनिक अधिकारी के कंप्यूटर से प्राप्त किए गए थे, न कि संगठन के सुरक्षित नेटवर्क से।

कुडनकुलम परियोजना का मामला भी बना था चर्चा का विषय

हाल ही में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के कथित लीक होने का मामला भी सुर्खियों में रहा था।

एक साइबर अपराधी समूह ने दावा किया था कि उसने परियोजना से संबंधित हजारों फाइलें हासिल कर ली हैं। इनमें इंजीनियरिंग ड्रॉइंग, आपूर्तिकर्ताओं का विवरण और कई वर्षों की बैठकों से जुड़े दस्तावेज शामिल होने की बात कही गई थी।

हालांकि सरकार और परमाणु ऊर्जा निगम ने स्पष्ट किया था कि ये दस्तावेज केवल निर्माण और सेवाओं से जुड़े अनुबंधों तक सीमित थे। इनका परमाणु सुरक्षा, रिएक्टर संचालन या संवेदनशील परमाणु प्रणालियों से कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जानकारियां भी शत्रुतापूर्ण तत्वों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।

क्या देश की साइबर सुरक्षा पर्याप्त है?

इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं में साइबर सुरक्षा के मौजूदा मानक पर्याप्त हैं।

खुफिया अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर सुरक्षा प्रोटोकॉल और दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर सुरक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है। सूचना प्रौद्योगिकी ढांचे का नियमित आधुनिकीकरण, समय-समय पर सॉफ्टवेयर अपडेट, नेटवर्क मॉनिटरिंग और साइबर सुरक्षा पर लगातार निवेश अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।

डिजिटल सीमाओं की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी

भारत रक्षा निर्माण, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और आधुनिक सामरिक तकनीकों के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ साइबर खतरों का दायरा भी तेजी से बढ़ रहा है।

अब केवल देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल सीमाओं की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। यदि संवेदनशील डाटा सुरक्षित नहीं रहेगा, तो आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियां भी साइबर अपराधियों और शत्रु देशों के निशाने पर आ सकती हैं।

प्रश्नपत्र लीक की तरह अब डाटा लीक को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दे के रूप में देखने की आवश्यकता है। हालांकि DRDO डाटा लीक मामले की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इस तरह के दावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश को अपनी साइबर सुरक्षा रणनीति और डिजिटल रक्षा तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। आने वाले समय में तकनीकी सुरक्षा, सतर्क निगरानी और मजबूत साइबर ढांचा ही भारत की सामरिक शक्ति की सबसे बड़ी सुरक्षा कवच साबित होगा।