National Thoughts Logo
National Thoughts
AWebPortalOfPositiveJournalism

मोहन भागवत का बड़ा बयान: “भारत ने न कब्जा किया, न धर्म बदला”

a
admin
31 अगस्त 2026 को 05:29 am बजे
Featured Image

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत की सभ्यतागत सोच और वैश्विक दृष्टिकोण पर विस्तार से बात की। ‘कैनेडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग’ (CHORD) की ओर से आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु- दोस्ती के साथ दुनिया को अपनाएं’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि भारत कभी महाशक्ति बनने की होड़ में नहीं रहा। इसके बजाय, सेवा, ज्ञान और मानवता के प्रति अपने दृष्टिकोण के कारण भारत को ‘विश्वगुरु’ की पहचान मिली।

कार्यक्रम की शुरुआत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पारंपरिक लोकगीतों से हुई। इस मौके पर कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी सहित भारतीय मूल के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

महाशक्ति नहीं, मानवता की सेवा से ‘विश्वगुरु’ बना भारत

मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल प्रभुत्व स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि मानवता की सेवा के लिए किया। उन्होंने कहा कि भारत के सभ्यतागत स्वभाव में दोस्ती, सेवा, शरण देने और विविधता के सम्मान की भावना मौजूद है।

उन्होंने कहा कि भारत को कभी महाशक्ति कहा जा सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य महाशक्ति बनना नहीं था। अपने स्वभाव के कारण भारत ‘विश्वगुरु’ बना। उनके अनुसार भारत का उदय मानवता को अधिक एकजुट और स्वतंत्र बनाने की दिशा में होना चाहिए।

संकट में फंसे लोगों की मदद भारत की परंपरा

भागवत ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में संकट का सामना कर रहे लोगों की मदद करने की भारत की परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब भी भारत से मदद मांगी गई, देश ने यथासंभव सहायता की और कई बार बिना मांगे भी मदद का हाथ बढ़ाया।

उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश शरणार्थियों का उदाहरण देते हुए कहा कि जामनगर के महाराजा ने उन्हें शरण और सुरक्षा प्रदान की थी, जब तक वे सुरक्षित रूप से अपने देश वापस नहीं लौट सके।

भागवत ने हाल के मध्य-पूर्व संघर्षों के दौरान भारत द्वारा चलाए गए निकासी अभियानों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सैन्य परिवहन विमानों के जरिए भारतीय नागरिकों के साथ-साथ युद्ध क्षेत्र में फंसे अन्य देशों के नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया।

‘विविधता में ही एकता की अभिव्यक्ति’

RSS प्रमुख ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां लोगों को भाषा, आस्था, संस्कृति और जीवनशैली की विविधता के बावजूद एकता को पहचानना सिखाया गया है।

उन्होंने कहा कि भारत में विविधता को कभी एकता के लिए बाधा नहीं माना गया। भारतीय परंपरा यह मानती है कि विविधता स्वयं एकता का ही एक रूप है।

उन्होंने कहा कि समाज को विविधताओं को स्वीकार करने, उनका सम्मान करने और उनके साथ सहयोग की भावना से आगे बढ़ने की जरूरत है।

‘वसुधैव कुटुंबकम’ का दिया संदेश

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय विचार वसुधैव कुटुंबकम’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले लोग पूरी पृथ्वी को एक परिवार के रूप में देखते हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया के लोगों के रूप-रंग, भाषा, संस्कृति और जीवनशैली में भले ही अंतर हो, लेकिन मूल रूप से सभी मनुष्य एक हैं। इसी सोच के आधार पर दूसरों की सेवा करना मानवता का दायित्व बनता है।

भारत का विस्तार ज्ञान बांटने के लिए था

भारत के ऐतिहासिक विस्तार की चर्चा करते हुए भागवत ने कहा कि भारतीय पूर्वज दूसरे देशों में विजय या साम्राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से नहीं गए, बल्कि ज्ञान और सभ्यतागत मूल्यों को साझा करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचे।

उन्होंने भारत की यात्राओं और विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान के प्रसार का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीयों ने जहां भी कदम रखा, वहां ज्ञान साझा किया। उन्होंने ज्योतिष, आयुर्वेद और अन्य भारतीय ज्ञान परंपराओं का भी उल्लेख किया।

भागवत ने कहा कि भारतीयों ने किसी देश को जीतने या वहां के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के बजाय अपने ज्ञान और अनुभव को साझा करने की परंपरा अपनाई। यही सेवा और ज्ञान-वितरण की भावना भारत के सभ्यतागत ‘DNA’ का हिस्सा है।

हिंदू पहचान को किसी एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं किया जा सकता

मोहन भागवत ने हिंदू पहचान की व्यापक अवधारणा पर भी बात की। उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द को किसी विशेष भाषा, पूजा-पद्धति या जीवनशैली तक सीमित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा सभी का सम्मान करने और सभी को स्वीकार करने की भावना पर आधारित है। भारत की प्राचीन सोच विविधता को स्वाभाविक मानते हुए एकता को मूल सत्य के रूप में देखती है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपनी साझा मानवता को पहचानें और विविधताओं के बीच आपसी सम्मान, सहयोग और संवाद की भावना को मजबूत करें।