नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड: वन ह्यूमैनिटी’ धर्मगुरुओं के सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग धर्मों के बीच एकता, शांति और आपसी सद्भाव की जरूरत पर जोर दिया।
कई धर्मगुरुओं की मौजूदगी में भागवत ने कहा कि आज धर्म को काफी हद तक उसके रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रक्रियाओं के जरिए समझा जाता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक अनुशासन और ईश्वर की ओर बढ़ने के लिए ये परंपराएं जरूरी हैं, लेकिन धर्म का वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं व्यापक है। उनके मुताबिक, धर्म इंसान को सत्य की ओर ले जाने का मार्ग है।
‘धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है’
भागवत ने कहा कि वह ऐसे समाज की परंपरा से आते हैं, जो मानता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। उन्होंने कहा कि सत्य एक है और पूरी मानवता उसी सत्य से जुड़ी हुई है।
उन्होंने अलग-अलग धार्मिक मार्गों का उदाहरण देते हुए कहा कि रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य एक ही सत्य की ओर बढ़ना होना चाहिए।
प्राचीन भारतीय परंपराओं को समझने की जरूरत
मोहन भागवत ने समाज को भारत की प्राचीन परंपराओं और उनके मूल विचारों से परिचित कराने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत की कई परंपराएं कायम रहीं और इन परंपराओं ने ‘एक दुनिया, एक मानवता’ की भावना को आगे बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदाय और धर्म अपनी-अपनी परंपराओं का पालन कर सकते हैं, लेकिन सभी के बीच मानवता और सत्य का साझा आधार मौजूद है।
हिंदुत्व को लेकर क्या बोले मोहन भागवत?
अपने संबोधन में भागवत ने वर्ष 2018 में मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस दौरान उनसे RSS के ‘हिंदू राष्ट्र’ के विचार को लेकर सवाल पूछा गया था।
भागवत ने कहा, “अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदुत्व की मूल भावना के प्रति सच्चा नहीं है।”
उन्होंने कहा कि हिंदू जीवन पद्धति को समझने और अपनाने के कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य एक ही सत्य की ओर बढ़ना है। उन्होंने यह भी कहा कि इंसानों के बीच कोई बुनियादी अंतर नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।
मुस्लिम और ईसाई समुदायों से संवाद पर जोर
RSS प्रमुख ने कहा कि संगठन ने भारत में रहने वाले मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद शुरू किया है। उनके मुताबिक, संवाद पहला कदम है, लेकिन सेवा को संवाद के बाद की प्रक्रिया नहीं माना जाना चाहिए। दोनों कार्य एक साथ चलने चाहिए।
भागवत ने कहा कि RSS विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कार्य कर रहा है और सेवा के दौरान किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
उन्होंने संगठन को लेकर बनी गलत धारणाओं का भी जिक्र किया। भागवत के अनुसार, RSS अपने काम के प्रचार में काफी पीछे है, लेकिन जब लोग संगठन के कार्यों को समझते हैं और उन्हें करीब से देखते हैं, तो कई धारणाएं तेजी से बदल सकती हैं।
राजनीति और युद्ध को लेकर भी रखी राय
मोहन भागवत ने आधुनिक राजनीति पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि खासकर लोकतंत्र में राजनीति काफी हद तक जनता की राय पर निर्भर करती है और कोई भी राजनेता आसानी से जनता की राय के खिलाफ नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि RSS की कोशिश है कि घटनाएं होने के बाद राजनीति को प्रभावित करने के बजाय घटनाओं से पहले राजनीति को सही दिशा देने की कोशिश की जाए। उन्होंने कहा कि युद्ध रोकने और समाज में शांति स्थापित करने जैसे मुद्दों पर काम करने के लिए किसी न किसी स्तर पर राजनीति को प्रभावित करना जरूरी हो सकता है।
‘राजनीति स्वार्थ का खेल बन गई है’
भागवत ने कहा कि राजनीति की वजह से धार्मिक सद्भाव स्थापित करने में भी कई बार मुश्किलें आती हैं। उन्होंने कहा कि आज राजनीति कई जगह ‘मैं और मेरा’ की भावना से प्रभावित हो गई है, जबकि ऐसी सोच से समाधान निकालना मुश्किल है।
उन्होंने इसके बजाय ‘हम और हमारा’ की भावना को समाधान का रास्ता बताया। भागवत ने कहा कि भारत के अनुभव से यह समझा जा सकता है कि स्थायी बदलाव की शुरुआत समाज से होनी चाहिए और RSS ने इसी दिशा में काम शुरू किया है।







