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रामायण कथा: कुबेर और रावण का क्या था रिश्ता? जानें पौराणिक कहानी

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admin
17 जून 2026 को 06:13 am बजे
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रामायण में रावण को लंका का पराक्रमी राजा, महान विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त बताया गया है, जबकि कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष और धन के देवता माने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन दोनों का रिश्ता केवल लंका से नहीं, बल्कि रक्त संबंध से भी जुड़ा था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान थे, लेकिन उनकी माताएं अलग-अलग थीं। यही कारण था कि दोनों के स्वभाव, विचार और जीवन की दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न रही।

रामायण और पुराणों के अनुसार, कुबेर पहले लंका के राजा थे। बाद में रावण ने बलपूर्वक उनसे लंका छीन ली और उनके दिव्य पुष्पक विमान पर भी अधिकार कर लिया। आइए जानते हैं इस रोचक पौराणिक कथा के बारे में।

महर्षि विश्रवा के पुत्र थे कुबेर और रावण

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि पुलस्त्य, ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक थे। उनके पुत्र महर्षि विश्रवा महान तपस्वी और विद्वान ऋषि थे।

महर्षि विश्रवा का पहला विवाह इलविला से हुआ था, जिनसे कुबेर का जन्म हुआ। कुबेर बचपन से ही धर्मनिष्ठ, तपस्वी और देवताओं के प्रिय थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और धन का अधिपति बनने का वरदान प्राप्त किया।

बाद में महर्षि विश्रवा का विवाह राक्षसराज सुमाली की पुत्री कैकसी से हुआ। कैकसी से रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ। इस प्रकार कुबेर और रावण सौतेले भाई थे।

कैसे बने कुबेर धन के देवता?

कथा के अनुसार कुबेर ने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी साधना से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया और समस्त धन-संपत्ति का स्वामी होने का अधिकार प्रदान किया।

ब्रह्मा जी ने उन्हें उत्तर दिशा का दिक्पाल भी बनाया। इसी कारण कुबेर को उत्तर दिशा का अधिपति माना जाता है। उन्हें अलकापुरी का स्वामी बनाया गया और दिव्य पुष्पक विमान प्रदान किया गया, जो इच्छानुसार कहीं भी जा सकता था।

लंका पर था कुबेर का शासन

रामायण और पुराणों के अनुसार स्वर्णमयी लंका का निर्माण दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने किया था। प्रारंभ में यह नगरी राक्षसों के अधिकार में थी, लेकिन बाद में परिस्थितियों के बदलने पर महर्षि विश्रवा ने अपने पुत्र कुबेर को वहां निवास करने की अनुमति दी।

कुबेर ने लंका को अपनी राजधानी बनाया और धर्मपूर्वक शासन किया। उनके शासनकाल में लंका समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य का केंद्र बन गई थी। राज्य में शांति और सुव्यवस्था बनी रहती थी।

सुमाली की योजना से बदली लंका की किस्मत

जब राक्षसराज सुमाली को पता चला कि लंका पर कुबेर शासन कर रहे हैं, तो वह अत्यंत दुखी हुआ। वह चाहता था कि लंका पर फिर से राक्षसों का अधिकार स्थापित हो।

इसी उद्देश्य से उसने अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से कराया, ताकि उनकी संतानें अत्यंत शक्तिशाली हों और भविष्य में लंका को वापस प्राप्त कर सकें। समय के साथ रावण बड़ा हुआ और उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से कई वरदान प्राप्त किए।

रावण ने कैसे छीनी स्वर्णमयी लंका?

जब रावण अत्यधिक शक्तिशाली बन गया, तब उसके मन में लंका पर अधिकार करने की इच्छा जागृत हुई। उसने अपने नाना सुमाली और अन्य राक्षसों के परामर्श से लंका को अपना अधिकार क्षेत्र मानना शुरू कर दिया।

इसके बाद रावण ने कुबेर को चुनौती दी। कुछ पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि महर्षि विश्रवा ने अनावश्यक रक्तपात से बचने के लिए कुबेर को लंका छोड़ने की सलाह दी। इसके बाद कुबेर कैलाश पर्वत के समीप स्थित अलकापुरी चले गए और रावण ने लंका पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

पुष्पक विमान पर भी किया कब्जा

कुबेर के पास दिव्य पुष्पक विमान था, जिसे ब्रह्मा जी का वरदान माना जाता है। यह विमान इच्छानुसार उड़ सकता था और उसमें असंख्य यात्रियों के बैठने की क्षमता थी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण ने केवल लंका ही नहीं छीनी, बल्कि अपने बड़े भाई कुबेर का पुष्पक विमान भी बलपूर्वक अपने अधिकार में ले लिया। बाद में रावण इसी विमान से विभिन्न लोकों की यात्राएं करता था।

भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध के बाद यही पुष्पक विमान अयोध्या लौटने का माध्यम बना।

दोनों भाइयों के स्वभाव में था बड़ा अंतर

यद्यपि कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान थे, फिर भी दोनों के चरित्र और आचरण में जमीन-आसमान का अंतर था।

कुबेर धर्म, संयम, तपस्या और लोककल्याण के प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने सदाचार और तपबल के माध्यम से सम्मान प्राप्त किया। वहीं रावण महान विद्वान और शिवभक्त होने के बावजूद अपने अहंकार, शक्ति और विजय की लालसा के कारण कई संघर्षों में उलझ गया।

अंततः उसका बढ़ता अभिमान ही उसके पतन का कारण बना और भगवान श्रीराम के हाथों उसका वध हुआ। यह कथा बताती है कि जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और आचरण से व्यक्ति की पहचान बनती है।