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रामायण: कौन थे केवट? श्रीराम को गंगा पार कराने वाले भक्त की कथा

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admin
29 जून 2026 को 04:47 am बजे
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Ramayana: रामायण में केवट का प्रसंग भक्ति, विनम्रता और भगवान के प्रति अटूट समर्पण का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। निषाद समुदाय के इस साधारण नाविक ने अपनी निष्काम सेवा और श्रद्धा से ऐसा स्थान प्राप्त किया कि उसका नाम सदियों से श्रद्धापूर्वक लिया जाता है। अयोध्याकांड में वर्णित यह प्रसंग आज भी भक्तों को सेवा, प्रेम और समर्पण का संदेश देता है।

कौन थे केवट?

केवट निषाद समुदाय का एक नाविक था, जो गंगा नदी के किनारे रहकर लोगों को नाव से एक तट से दूसरे तट तक पहुंचाने का कार्य करता था। उसका परिवार भी इसी आजीविका पर निर्भर था। वह सरल स्वभाव, विनम्र व्यक्तित्व और भगवान के प्रति गहरी आस्था रखने वाला व्यक्ति था।

जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान श्रृंगवेरपुर पहुंचे, तब उन्हें गंगा नदी पार करनी थी। निषादराज गुह ने उनका स्वागत किया और नदी पार कराने के लिए केवट को बुलाया। यहीं से रामायण का एक अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग आरंभ होता है।

वनवास के दौरान गंगा तट पर पहुंचे श्रीराम

राजा दशरथ के वचन और कैकेयी के वरदानों के कारण भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान कर गए।

यात्रा के दौरान वे तमसा नदी होते हुए श्रृंगवेरपुर पहुंचे। वहां निषादराज गुह ने उनका आदर-सत्कार किया और विश्राम की व्यवस्था की। अगले दिन गंगा नदी पार करने के लिए केवट को बुलाया गया।

केवट ने तुरंत नाव क्यों नहीं लाई?

जब केवट को पता चला कि भगवान श्रीराम को गंगा पार करानी है, तो वह तुरंत नाव लेकर नहीं पहुंचा। उसे भगवान के चरणों की महिमा का स्मरण था।

उसने सुना था कि भगवान श्रीराम के चरणों की धूल से गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में आ गई थीं। केवट को चिंता हुई कि यदि प्रभु के चरणों की धूल उसकी लकड़ी की नाव पर पड़ गई और वह भी किसी दिव्य रूप में बदल गई, तो उसके परिवार की आजीविका समाप्त हो जाएगी।

इसी कारण उसने पहले भगवान के चरण धोने की विनती की।

भगवान के चरण धोने का भावपूर्ण प्रसंग

केवट ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा कि वह बिना चरण धोए प्रभु को नाव में नहीं बैठा सकता। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि जब पत्थर तक आपके चरण स्पर्श से बदल गया, तो मेरी लकड़ी की नाव का क्या होगा?

भगवान श्रीराम केवट की निष्कपट भक्ति देखकर मुस्कुरा दिए और उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। केवट जल लेकर आया और अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवान श्रीराम के चरण पखारे। मान्यता है कि उसने उस पवित्र जल को अपने परिवार को भी दिया और स्वयं भी चरणामृत के रूप में ग्रहण किया।

गंगा पार कराने का सौभाग्य

चरण पखारने के बाद केवट ने भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाया और पूरे सम्मान तथा श्रद्धा के साथ गंगा नदी पार कराई। उसके लिए यह केवल नाव चलाने का कार्य नहीं, बल्कि भगवान की सेवा का दुर्लभ अवसर था।

दूसरे तट पर पहुंचने के बाद श्रीराम आगे वन की ओर प्रस्थान करने लगे।

पारिश्रमिक लेने से क्यों किया इंकार?

गंगा पार कराने के बाद भगवान श्रीराम ने केवट को उसकी सेवा का पारिश्रमिक देना चाहा। माता सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर देने का संकेत भी किया, लेकिन केवट ने विनम्रता से उसे स्वीकार करने से मना कर दिया।

उसने भावुक होकर कहा कि वह भी लोगों को नदी पार कराने का कार्य करता है और भगवान श्रीराम भी जीवों को संसार रूपी भवसागर से पार लगाते हैं। एक ही व्यवसाय करने वाले लोग एक-दूसरे से पारिश्रमिक नहीं लेते।

केवट ने कहा, “आज मैंने आपको गंगा पार कराया है, जब मेरा समय आएगा तब आप मुझे भवसागर से पार लगा दीजिए। यही मेरे लिए सबसे बड़ा प्रतिफल होगा।”

केवट की निष्काम भक्ति और समर्पण से भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे अपना आशीर्वाद प्रदान किया।

केवट प्रसंग से मिलने वाली सीख

केवट की कथा हमें सिखाती है कि भगवान तक पहुंचने के लिए धन, पद या वैभव नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा, विनम्रता और निष्काम सेवा की आवश्यकता होती है। केवट ने अपने व्यवहार से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा भक्त वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के भगवान की सेवा करे और बदले में केवल उनकी कृपा की कामना रखे।