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कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना बदलने का खतरा

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admin
19 अक्टूबर 2026 | 11:34 am IST
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वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं में मौजूद प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे से बनने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, बल्कि गेहूं से बने उत्पादों के पाचन और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर भी पड़ सकता है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।

‘फूड केमिस्ट्री’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के दौर में फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ उनकी पोषण गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना पर भी ध्यान देना जरूरी है।

1980 से लगातार बढ़ रहा है CO₂ का स्तर

जर्मनी के म्यूनिख स्थित टेक्निकल यूनिवर्सिटी के लाइबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में बताया गया कि वातावरण में CO₂ का स्तर 1980 में लगभग 340 पार्ट्स प्रति मिलियन (PPM) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 PPM हो गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, दुनिया की प्रमुख खाद्य फसलों में शामिल गेहूं को भी भविष्य में अधिक CO₂ सांद्रता वाले वातावरण में उगना पड़ेगा। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक वातावरण में इसका स्तर 600 PPM तक पहुंच सकता है।

गेहूं की 10 किस्मों पर किया गया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 उन्नत किस्मों को खेती और पर्यावरण की वास्तविक परिस्थितियों में उगाया। इनमें से कुछ पौधों को CO₂ की बढ़ी हुई सांद्रता यानी 546 PPM में रखा गया, जबकि अन्य को मौजूदा स्तर के वातावरण में उगाया गया।

फसल की कटाई के बाद वैज्ञानिकों ने उच्च-रिजॉल्यूशन वाली मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक की मदद से गेहूं के नमूनों में मौजूद विभिन्न प्रोटीनों की संरचना का विश्लेषण किया। अध्ययन में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड पर विशेष ध्यान दिया गया।

कुछ प्रोटीन बढ़े, तो कुछ की मात्रा घटी

अध्ययन में पाया गया कि CO₂ की बढ़ी हुई सांद्रता में उगाए गए गेहूं में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर (ATI) की मात्रा बढ़ गई। इसके विपरीत, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड की मात्रा में कमी दर्ज की गई।

ये पेप्टाइड पाचन के दौरान ग्लूटेन प्रोटीन से बन सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ATI की बढ़ी हुई मात्रा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। हालांकि, इन बदलावों का प्रभाव गेहूं की किस्म के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

लाइबनिज इंस्टीट्यूट की प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज ने कहा कि प्रोटीन संरचना में होने वाले बदलावों की सीमा काफी हद तक गेहूं की संबंधित किस्म पर निर्भर करती है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्लूटेन प्रोटीन की कम सांद्रता का संबंध बेकिंग की खराब गुणवत्ता से पाया गया।

गेहूं से बनने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर असर

संस्थान में खाद्य बायोपॉलिमर रसायन शोध समूह की प्रमुख और टीयूएम स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में प्रोफेसर कैथरीना शेर्फ के अनुसार, ATI और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड में बदलाव लंबे समय में गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि, इन बदलावों के वास्तविक जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रभावों को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। फिलहाल, अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि CO₂ बढ़ने से गेहूं से संबंधित बीमारियां निश्चित रूप से बढ़ेंगी।

जलवायु परिवर्तन के अनुकूल गेहूं की किस्में विकसित करने पर जोर

शोधकर्ताओं ने कहा कि भविष्य में ऐसी गेहूं की किस्मों की पहचान और विकास करना महत्वपूर्ण होगा, जो वातावरण में CO₂ की बढ़ती सांद्रता के बावजूद अपनी पोषण संबंधी विशेषताओं और बेकिंग गुणवत्ता को बनाए रख सकें।

वैज्ञानिकों का जोर ऐसी किस्में विकसित करने पर है, जिनमें ATI और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले पेप्टाइड की मात्रा कम हो तथा जिनसे बने आटे की गुणवत्ता भी अच्छी बनी रहे।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि वातावरण में CO₂ का बढ़ता स्तर गेहूं की प्रोटीन संरचना और खाद्य गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के अनुरूप फसल उत्पादन की रणनीति बनाते समय पैदावार के साथ-साथ अनाज की गुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।