युथिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में कौन सी एकादशी आती है। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-भादोंके शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा के नाम से है । उस दिन भगवान् हृषीकेशकी पूजा होती है। यह उत्तम जरूर करना चाहिए। इसके पीछे राजा मांधाता की कथा है। वे बहपत प्रतापी और सच बोलने वाले राजा थे। वे प्रजा को अपने बच्चों की तरह पालते थे और धर्म का पालन करते हैं। उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था। इसके अलावा किसी को मानसिक तौर पर चिंता भी नहीं थी। उनकी प्रजा को किसी तरह का कोई डर भी नहीं था और प्रजा के पास पर्याप्त धन था। महाराज के पास सिर्फ न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था। उनके राज्य में सभी वर्णों और आश्रमों के लोग अपने-अपने धर्म में लगे रहते थे। मान्धाता के राज्य की जमीन कामधेनु की तरह थी । कुल मिलाकर प्रजा सुख में रह रही थी। किसी को जेल नहीं जाना पड़ता था, कोई भूख से पीड़ित नहीं होता था।
एक बार की बात है तीन साल तक बारिश नहीं हुई जिससे प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी। तब सारी प्रजा ने राजा के पास आकर बोला-बारिश ना होने के कारण सभी परेशान थे, तभी प्रजा ने कहा कि राजा हमारी बात सुनें। पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को नारा कहा है; वह नारा ही भगवान का अयन का निवास स्थान है; इसलिए वे नारायण कहलाते हें। नारायणस्वरूप भगवान् विष्णु सर्वत्र व्यापकरूप में विराजमान हें। वे ही मेघस्वरूप होकर बारिश करते हैं, इससे ही अन्न पैदा होता है। इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, इसलिए कोई ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे सभी का कल्याण हो। राजा ने कहा-आप लोगों ने सही बात कही है। अन्न से ही प्राणी जीवित रह सकता है। लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है और पुराण में भी इसके बारे में कहा गया है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, लेकिन मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि मैंने क्या अपराध किया है। फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूरी कोशिश करूंगा।
ऐसा सोचकर राजा मान्धाता राजा जंगल को चल दिए, वहां मुनियों और तपस्वियों के आश्रम मिले। एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अ्धिरा ऋषि का दर्शन हुआ। उनपर दृष्टि पड़ते ही राजा खुशी से उनके पास जाकर बोले कि और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर मेरा प्रणाम स्वीकार करें। इसके बाद राजा ने अपनी कुशल बताकर मुनि की सेहत के बारे में जाना। मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया। उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बेठे तो उन्होंने राजा से पूछा किस काम के लिए आए हो। तब राजा ने कहा कि भगवान मेरे राज्य में बारिश नहीं हो रही है।
इसका कारण मैं जानना चाहता हूं। ऋषि बोले–राजन् ! यह सब युगोंमें उत्तम सत्ययुग है। इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं। इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं। लेकिन आपके राज्य में शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते। तुम इसके लिए कोशिश करों , जिससे दोष शान्त हो जाए। राजा ने कहा–मुनिवर ! एक तो यह तपसया में लगा है, दूसरे निरपराध है; अतः मैं इसको कैसे हटा सकता हूं। आप उक्त दोष को शान्त करने वाले किसी धर्म का उपदेश कीजिए।
ऋषि बोले–राजन अगर ऐसी बात है तो तुम एकादशी का व्रत करो। भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष में पद्मा जिसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं, इसका व्रत करो। तुम अपनी प्रजा ओर परिजनों के साथ इसका व्रत करो | ऋषि का यह वचन सुनकर राजा अपने घर आए और प्रजा के साथ भादों के शुक्ल एकादशी का व्रत किया | इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से भर गई। सब लोग सुखी हो गए। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं–राजन्! इस कारण इस उत्तम व्रत को जरूर करना चाहिए। इस एकादशी के दिन जल से भरे हुए घड़े को दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए। छाता ओर जूता भी देने चाहिए । दान करते समय इस प्रकार बोलें-आपको नमस्कार है, नमस्कार है; मेरी पाप राशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले तथा सुखदायक हैं । राजन इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।







