जम्मू-कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुतबे (धार्मिक उपदेश) में सामाजिक समस्याओं को शामिल करने के प्रस्ताव पर सियासी विवाद तेज हो गया है। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. सैयद दरख्शां अंद्राबी के बयान के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस पहल पर सवाल उठाए हैं। दोनों नेताओं ने इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कथित हस्तक्षेप से जोड़ा है। वहीं, मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU) ने भी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल की आशंका जताई है।
दूसरी ओर, दरख्शां अंद्राबी ने स्पष्ट किया है कि वक्फ बोर्ड ने मस्जिदों में एक जैसा शुक्रवार का खुतबा देने का कोई बाध्यकारी आदेश जारी नहीं किया है। उनके मुताबिक, नशाखोरी, आत्महत्या, पारिवारिक तनाव और युवाओं में बढ़ते मानसिक दबाव जैसी समस्याओं पर चर्चा करने का विचार धार्मिक विद्वानों की स्वतंत्र पहल है।
क्या है पूरा मामला?
श्रीनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दरख्शां अंद्राबी ने कहा कि वक्फ बोर्ड ने अपने नियंत्रण वाली मस्जिदों को एक समान खुतबा देने का कोई निर्देश नहीं दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का अधिकार इमामों, खतीबों और इस्लामिक विद्वानों के पास है।
अंद्राबी के अनुसार, धार्मिक विद्वान समाज की समस्याओं को समझते हैं और अपनी समझ के आधार पर तय कर सकते हैं कि जुमे के उपदेश में किन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि इस पहल को सरकारी आदेश या धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में पेश करना सही नहीं है।
नशाखोरी और मानसिक तनाव जैसे मुद्दों पर जोर
दरख्शां अंद्राबी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में नशाखोरी, आत्महत्या, विवाह से जुड़ी परेशानियां, पारिवारिक तनाव और मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याओं पर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है।
उन्होंने तर्क दिया कि धार्मिक विद्वान अपने उपदेशों के माध्यम से लोगों को सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक कर सकते हैं। उनके मुताबिक, धार्मिक मार्गदर्शन का उद्देश्य समाज में सकारात्मक बदलाव लाना भी हो सकता है। हालांकि, किन विषयों पर चर्चा की जाए, इसका निर्णय धार्मिक विद्वानों पर ही छोड़ा जाना चाहिए।
कोर कमेटी में शामिल नहीं होंगी अंद्राबी
वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष ने प्रस्तावित कोर कमेटी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि समिति में धार्मिक विद्वान शामिल होंगे, जो सामाजिक और धार्मिक महत्व के मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे।
अंद्राबी ने कहा कि वह स्वयं इस समिति की सदस्य नहीं होंगी और न ही उसके फैसलों में हस्तक्षेप करेंगी। उन्होंने खुद को धार्मिक शिक्षक मानने से इनकार करते हुए कहा कि धार्मिक मार्गदर्शन से जुड़े फैसले योग्य इस्लामिक विद्वानों पर छोड़ दिए जाने चाहिए।
उमर अब्दुल्ला ने BJP पर उठाए सवाल
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष पर भाजपा को खुश करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भाजपा द्वारा नियुक्त अध्यक्ष को मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की कोशिश बंद करनी चाहिए।
इस पर पलटवार करते हुए दरख्शां अंद्राबी ने सवाल किया कि इस मामले में भाजपा ने हस्तक्षेप कहां किया है। उन्होंने भाजपा से अपने जुड़ाव पर गर्व जताते हुए कहा कि पार्टी से जुड़ा होना उनके लिए गर्व की बात है।
इस बयान के बाद विवाद ने राजनीतिक रंग ले लिया है। जहां उमर अब्दुल्ला इस पहल को भाजपा की कथित दखलंदाजी से जोड़ रहे हैं, वहीं अंद्राबी ने इन आरोपों को खारिज किया है।
महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड को सरकार के अधीन करने की मांग की
पीडीपी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस पहल का विरोध किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहती है और जम्मू-कश्मीर को अपनी नीतियों के प्रयोग की जगह बना रही है।
महबूबा ने धार्मिक मामलों में एकरूपता थोपने की कोशिश पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इमाम और मौलवी शुक्रवार को क्या उपदेश देंगे, यह तय करने का अधिकार किसी राजनीतिक नेतृत्व या बोर्ड को कैसे मिल सकता है।
उन्होंने वक्फ बोर्ड को जम्मू-कश्मीर सरकार के अधीन करने की मांग भी की। महबूबा के मुताबिक, इस तरह के मामलों में मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा जैसे धार्मिक संगठनों की भूमिका अहम होनी चाहिए।
मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने भी जताया विरोध
मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU) ने भी इस मुद्दे पर आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि किसी वैधानिक संस्था द्वारा मस्जिदों के मिंबर से दिए जाने वाले धार्मिक उपदेशों को तय या नियंत्रित करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं होगा।
संगठन ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों में स्वायत्तता के सिद्धांतों से जुड़ा मुद्दा बताया। इस विरोध के बाद विवाद और व्यापक हो गया है।
धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार पर बहस तेज
वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष के स्पष्टीकरण के बावजूद जम्मू-कश्मीर में यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। एक ओर सामाजिक समस्याओं पर जागरूकता फैलाने की पहल का तर्क दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर राजनीतिक और धार्मिक नेता इसे धार्मिक स्वायत्तता से जोड़कर देख रहे हैं।
अब इस मुद्दे पर बहस का केंद्र यह है कि सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने और धार्मिक उपदेशों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले दिनों में इस मामले पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।







