नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट बुधवार को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर तत्काल सुनवाई करेगा। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती दी है। मामले की सुनवाई जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद करेंगे। इसके अलावा, हाईकोर्ट ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर भी सुनवाई करेगा।
नेहा बोरा ने SEM के नोटिस को दी चुनौती
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने का निर्देश दिया गया था। कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने उन्हें उस समय हिरासत में लिया था, जब वह मध्य दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च में शामिल होने जा रही थीं।
नेहा बोरा की याचिका में SEM के नोटिस को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट इस मामले में भी सुनवाई करेगा।
CJP नेताओं के खिलाफ दो मामलों की जांच क्राइम ब्रांच को
इस मामले में एक अन्य घटनाक्रम के तहत दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ दर्ज एक और मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया। सूत्रों के मुताबिक, अब क्राइम ब्रांच इन नेताओं के खिलाफ दर्ज दोनों मामलों की जांच करेगी।
इससे पहले सोमवार को जंतर-मंतर क्षेत्र में कथित तौर पर प्रवेश करने से संबंधित एक मामला भी क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था।
13 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए थे 14 लोग
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 13 अक्टूबर को सौरव दास, रांका, अजिंक्य शिंदे और CJP के 11 अन्य सदस्य कथित तौर पर निजी परिसरों से गुजरते हुए जंतर-मंतर पहुंच गए थे। जंतर-मंतर को अब विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल नहीं माना जाता है।
पुलिसकर्मियों ने मौके पर हस्तक्षेप करते हुए उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके बाद सभी 14 लोगों को हिरासत में ले लिया गया और उनके खिलाफ दो प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गईं।
न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाने के आदेश को चुनौती
14 अक्टूबर को शांति बनाए रखने के बॉन्ड का उल्लंघन करने के आरोप में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने सौरव दास और अजिंक्य रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। सोमवार को उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई।
इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने हिरासत बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जमानतदार प्रस्तुत करने के बावजूद उन्हें हिरासत में रखा जाना उनके स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
अब हाईकोर्ट की सुनवाई में यह तय होगा कि न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश और संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं पर अदालत का क्या रुख रहता है।







