National Thoughts Logo
National Thoughts
AWebPortalOfPositiveJournalism

दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: पत्रकारों के इलाज का खर्च देने से सरकार नहीं कर सकती इनकार

a
admin
5 नवंबर 2026 | 08:33 am IST
Featured Image

नई दिल्ली, 4 नवंबर। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार समाज और शासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते हैं। जनहित के मुद्दों को सामने लाने, सरकार की नीतियों और योजनाओं की जानकारी आम जनता तक पहुंचाने तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने में उनकी अहम भूमिका होती है। इसके बावजूद पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता एक गंभीर विषय बनी हुई है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारी अस्पतालों को कोविड अस्पताल घोषित किए जाने के कारण यदि सामान्य मरीजों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं और उन्हें मजबूरी में निजी अस्पताल में उपचार कराना पड़ता है, तो सरकार चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने रविंदर गुप्ता बनाम स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार मामले में यह फैसला सुनाया।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता रविंदर गुप्ता दिल्ली सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। उन्होंने अपनी पत्नी के उपचार पर सर गंगा राम अस्पताल और सर गंगा राम सिटी अस्पताल में खर्च हुई 11,83,105.21 रुपये की शेष राशि की प्रतिपूर्ति की मांग की थी।

उनकी पत्नी दाहिनी फीमोरल धमनी के संक्रमित छद्म-धमनीविस्फार से पीड़ित थीं और उन्हें तत्काल संवहनी शल्य चिकित्सा की आवश्यकता थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 4 अगस्त 2021 को उनकी पत्नी को जीबी पंत अस्पताल में जांच के बाद सर गंगा राम अस्पताल रेफर किया गया था, क्योंकि सरकारी अस्पताल में आवश्यक संवहनी शल्य चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। उस समय कोविड-19 महामारी के कारण कई सरकारी अस्पतालों को कोविड अस्पताल घोषित किया गया था, जिससे सामान्य मरीजों के उपचार की उपलब्धता प्रभावित हुई थी।

चिकित्सा प्रतिपूर्ति के दावे को किया गया था खारिज

रविंदर गुप्ता ने दिल्ली प्रेस रिपोर्टर एवं चिकित्सा सहायता नियम, 1955 के तहत चिकित्सा प्रतिपूर्ति का दावा किया था।

15 नवंबर 2011 की अधिसूचना के नियम 7 में आपातकालीन परिस्थितियों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों और उनके परिवार के सदस्यों को सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में उपचार कराने की अनुमति का प्रावधान है।

हालांकि, स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक ने 21 जुलाई 2025 के पत्र के माध्यम से यह कहते हुए प्रतिपूर्ति से इनकार कर दिया था कि मरीज की शल्य चिकित्सा आपातकालीन प्रकृति की नहीं थी।

अदालत ने आपातकालीन उपचार को माना जरूरी

न्यायमूर्ति अमित महाजन ने मामले के तथ्यों और अस्पताल द्वारा जारी आपातकालीन प्रमाणपत्र का परीक्षण करते हुए पाया कि मरीज को तत्काल भर्ती और उपचार की सलाह दी गई थी।

जीबी पंत अस्पताल का रेफरल और सर गंगा राम अस्पताल का आपातकालीन प्रमाणपत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि उपचार की आवश्यकता आपात परिस्थितियों में उत्पन्न हुई थी। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि प्रतिवादी पक्ष अस्पताल के आपातकालीन प्रमाणपत्र का खंडन करने में विफल रहा।

कोविड अस्पताल और हड़ताल की परिस्थितियों में कार्यात्मक समानता

सरकार की ओर से दलील दी गई कि नियम 7 के तहत प्रतिपूर्ति का लाभ तभी दिया जा सकता है, जब सरकारी अस्पतालों में हड़ताल हो। केवल अस्पताल को कोविड अस्पताल घोषित किए जाने को हड़ताल के समान नहीं माना जा सकता।

हालांकि, न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण से सरकारी अस्पताल में हड़ताल और उसे कोविड अस्पताल घोषित किए जाने की परिस्थितियों में कार्यात्मक समानता है।

दोनों ही स्थितियों में सामान्य मरीजों को नियमित चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं और उन्हें उपचार के लिए अन्यत्र जाना पड़ता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दोनों परिस्थितियों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मरीज के लिए उनका परिणाम समान हो सकता है।

दिल्ली सरकार को आठ सप्ताह में भुगतान का निर्देश

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक द्वारा 21 जुलाई 2025 को जारी प्रतिपूर्ति अस्वीकार करने वाले पत्र को निरस्त कर दिया।

साथ ही, दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि सर गंगा राम अस्पताल और सर गंगा राम सिटी अस्पताल में पत्नी के उपचार पर हुए 11,83,105.21 रुपये के शेष चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति आठ सप्ताह के भीतर की जाए।

न्यायालय ने यह स्वतंत्रता भी दी कि जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी से सरकार उक्त राशि की वसूली कर सकती है।

पत्रकारों के स्वास्थ्य अधिकारों के लिए अहम फैसला

इस फैसले के बाद मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति के महासचिव रजनीकांत तिवारी ने कहा कि कोर्ट के इस निर्णय का महत्व केवल एक पत्रकार को चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति मिलने तक सीमित नहीं है। यह पत्रकारों के स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों, उनके परिवारों की चिकित्सा सुरक्षा और सरकारी चिकित्सा सहायता नियमों की व्यावहारिक व्याख्या के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि विशेष रूप से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए सरकारी, निजी और अर्द्धसरकारी अस्पतालों में उपचार तथा चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से संबंधित नियमों को अधिक पारदर्शी और सरल बनाने की आवश्यकता सामने आती है।

पत्रकारों के लिए समान चिकित्सा सहायता नीति की जरूरत

इस संदर्भ में केंद्र और राज्य सरकारों को पत्रकारों के लिए एक समान, स्पष्ट और व्यावहारिक चिकित्सा सहायता नीति तैयार करने पर विचार करना चाहिए।

इसमें सरकारी अस्पतालों में उपचार उपलब्ध नहीं होने, विशेषज्ञ चिकित्सक या आवश्यक चिकित्सा सुविधा की अनुपलब्धता, आपातकालीन भर्ती तथा अस्पतालों के रेफरल की स्थिति में निजी अस्पतालों में उपचार की अनुमति और प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।

अर्द्धसरकारी अस्पतालों और सरकार से संबद्ध चिकित्सा संस्थानों में पत्रकारों के उपचार की पात्रता, मान्यता प्राप्त निजी अस्पतालों की सूची, परिवार के पात्र सदस्यों तथा बिलों के भुगतान की समय-सीमा भी निर्धारित की जानी चाहिए।

समयबद्ध भुगतान और अपील की व्यवस्था हो

फैसले को सराहनीय बताते हुए मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति के महासचिव रजनीकांत तिवारी ने कहा कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति के दावों के निस्तारण के लिए समयबद्ध व्यवस्था, अनावश्यक प्रशासनिक आपत्तियों पर रोक और अस्वीकृत दावों की समीक्षा के लिए स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आपातकालीन परिस्थितियों में उपचार के दौरान पहले मरीज की जान बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि पूर्व अनुमति और कागजी औपचारिकताओं में उलझना।

पत्रकारिता का दायित्व निभाने वाले लोगों को भी सम्मानजनक स्वास्थ्य सुरक्षा मिलनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारों और संबंधित विभागों के लिए चिकित्सा सहायता नियमों की समीक्षा करने तथा पत्रकारों के हित में स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।